नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम काल में जब हास्य अभिनय की चर्चा होती है तो राजेंद्र नाथ का नाम सम्मान से लिया जाता है। 1960 और 70 के दशक में अपनी विशिष्ट कॉमिक शैली और लाजवाब टाइमिंग से उन्होंने दर्शकों के बीच ऐसी पहचान बनाई जो आज भी कायम है। खासकर फिल्म जब प्यार किसी से होता है में निभाया गया उनका पोपटलाल का किरदार उन्हें घर घर तक ले गया और यही नाम उनकी स्थायी पहचान बन गया।
1961 में आई फिल्म जब प्यार किसी से होता है में देव आनंद और आशा पारेख मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फिल्म में राजेंद्र नाथ ने सहायक भूमिका निभाई, लेकिन उनके पोपटलाल किरदार ने मुख्य नायकों के बीच भी अलग छाप छोड़ी। उनका हावभाव, संवाद अदायगी और कॉमिक टाइमिंग इतनी सटीक थी कि दर्शकों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। देव आनंद के साथ उनकी स्क्रीन केमिस्ट्री ने फिल्म के हास्य दृश्यों को खास बना दिया। पोपटलाल का लुक और बोलने का अंदाज इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग उन्हें असली नाम से ज्यादा इसी किरदार से पहचानने लगे। उस दौर में जब जॉनी वॉकर और महमूद जैसे स्थापित हास्य कलाकार पहले से छाए हुए थे, तब अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था। राजेंद्र नाथ ने यह चुनौती स्वीकार की और सफल भी रहे। राजेंद्र नाथ का सफर सीधा नहीं था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की। पृथ्वी थिएटर में छोटे छोटे किरदार निभाते हुए उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखी। शुरुआती दिनों में उन्हें जो भी रोल मिला, उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। यही समर्पण आगे चलकर उनकी ताकत बना। फिल्मों में उन्हें पहले सहायक भूमिकाएं मिलीं, लेकिन उन्होंने हर किरदार को यादगार बनाने की कोशिश की। धीरे धीरे निर्माता और निर्देशक समझ गए कि यह कलाकार छोटे रोल में भी बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। यही कारण रहा कि वे 60 और 70 के दशक में लगभग हर बड़े अभिनेता के साथ नजर आए।
राजेंद्र नाथ ने अपने लंबे करियर में 200 से अधिक हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम किया। उनकी मौजूदगी फिल्म में हल्कापन और मनोरंजन का संतुलन बनाए रखती थी। वे केवल चुटकुले सुनाने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि स्थिति को समझकर हास्य रचने में माहिर थे। उनकी खासियत यह थी कि वे लीड रोल पर भी भारी पड़ जाते थे। कई फिल्मों में दर्शक मुख्य कहानी के साथ साथ उनके दृश्यों का इंतजार करते थे। उनकी संवाद अदायगी में स्वाभाविकता थी और चेहरे के भावों में मासूमियत। यही संयोजन उन्हें अलग बनाता था। राजेंद्र नाथ की कॉमेडी में अतिनाटकीयता कम और सहजता ज्यादा थी। वे किरदार को जीते थे। उनकी बॉडी लैंग्वेज, आवाज का उतार चढ़ाव और संवादों की गति उन्हें खास बनाती थी। उन्होंने यह साबित किया कि हास्य केवल शारीरिक हावभाव से नहीं, बल्कि परिस्थिति की समझ से भी पैदा होता है। आज के कलाकारों के लिए उनका करियर एक सीख है। उन्होंने कभी छोटे या बड़े रोल का हिसाब नहीं लगाया। उनका ध्यान केवल प्रदर्शन पर रहा। यही वजह है कि उनके कई दृश्य आज भी याद किए जाते हैं।
राजेंद्र नाथ का जन्म 8 जून 1931 को मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में हुआ था। 13 फरवरी 2008 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके जाने के बाद भी उनकी फिल्में और किरदार दर्शकों को मुस्कान देते हैं। पोपटलाल उनका सबसे चमकदार अध्याय रहा, लेकिन उनका योगदान इससे कहीं व्यापक है। उन्होंने हिंदी सिनेमा में हास्य अभिनय को नई पहचान दी। आज जब पुरानी फिल्में देखी जाती हैं तो उनके दृश्य अब भी उतने ही ताजगी भरे लगते हैं। राजेंद्र नाथ ने यह साबित किया कि प्रतिभा और मेहनत के दम पर भीड़ में अलग खड़ा हुआ जा सकता है। उनका नाम हिंदी सिनेमा के हास्य इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा।
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