नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई अचानक बाढ़, हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे पर डॉ. रंधावा ने जताई चिंता

खबर सार :-

नेपाल में अचानक आई बाढ़ को डॉ. एसएस रंधावा ने ग्लेशियर टूटने से जोड़ा। बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर और मोरेन-बांधित झीलों से हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे पर जताई चिंता।
नेपाल बाढ़ः हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे पर डॉ. रंधावा ने जताई चिंता

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शिमलाः नेपाल में हाल में आई भीषण बाढ़ को लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार के आपदा प्रबंधन सलाहकार और एचआईएमसीओएसटीई के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा ने इसे ग्लेशियर टूटने से जुड़ी घटना बताया है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर के अगले हिस्से के टूटने से कुछ समय के लिए पानी के बहाव में रुकावट पैदा हुई होगी। इसके बाद पानी का दबाव बढ़ने और अवरोध टूटने से अचानक तेज बहाव के साथ बाढ़ आई, जिसका व्यापक असर देखने को मिला।

डॉ. रंधावा के अनुसार, ग्लेशियर के पीछे धारा का पानी बह रहा था और ग्लेशियर के भीतर पहले से ही बर्फ पिघलने की प्रक्रिया जारी थी। ऐसी स्थिति में यदि ग्लेशियर का अगला हिस्सा टूटकर पानी के रास्ते में रुकावट पैदा करता है, तो उसके पीछे पानी जमा होने लगता है। कुछ समय बाद जब यह अवरोध टूटता है तो जमा पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। इस प्रक्रिया में अचानक आने वाला पानी निचले क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। उन्होंने कहा कि नेपाल में हुई घटना को इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि किसी विशेष घटना के अंतिम कारणों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक और स्थल-आधारित अध्ययन जरूरी हैं।

तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों पर बढ़ रहा खतरा

डॉ. रंधावा ने कहा कि हिमालय क्षेत्र में पुराने और नए दोनों तरह के भूगर्भीय क्षेत्र मौजूद हैं और यहां जलवायु परिवर्तन तथा तापमान में होने वाले बदलाव का सीधा प्रभाव ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। वर्तमान तापमान वृद्धि के चलते हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघलने की स्थिति में हैं। इससे भविष्य में ग्लेशियरों से जुड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 से 2017 के बीच किए गए एक अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के विभिन्न नदी बेसिनों में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई थी। अध्ययन के अनुसार चिनाब बेसिन में ग्लेशियर क्षेत्र में करीब 5.48 प्रतिशत, व्यास में 7.03 प्रतिशत, रावी में 4.69 प्रतिशत और बासपा क्षेत्र में करीब 6.52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। डॉ. रंधावा ने कहा कि ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर लगातार बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। तापमान में बढ़ोतरी के साथ बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज होने पर ग्लेशियरों के आकार और उनकी स्थिरता पर असर पड़ता है।

मोरेन सामग्री से बन रही झीलें

डॉ. रंधावा ने बताया कि पिछले करीब 30 से 32 वर्षों से अंतरिक्ष आधारित आंकड़ों के माध्यम से हिमाचल के ग्लेशियरों पर अध्ययन और निगरानी की जा रही है। इन अध्ययनों से पता चलता है कि कई ग्लेशियर पिघलने के चरण में हैं। उन्होंने समझाया कि ग्लेशियर के पिघलने के दौरान बर्फ और पानी आगे की ओर बह जाते हैं, जबकि ग्लेशियर के साथ मौजूद पत्थर, मिट्टी और अन्य मलबा यानी मोरेनिक सामग्री कई स्थानों पर जमा रह जाती है। धीरे-धीरे यह सामग्री जमा होकर पानी को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार का रूप ले सकती है और इसके पीछे झील बन सकती है।

ऐसी झीलों को मोरेन-बांधित हिमनद झील (Moraine-Dammed Glacial Lake) कहा जाता है। डॉ. रंधावा के मुताबिक ऐसी झीलें मुख्य रूप से दो तरह की होती हैं। एक झील ग्लेशियर के आगे बन सकती है, जबकि दूसरी ग्लेशियर के बीच या उससे जुड़े हिस्से में विकसित हो सकती है। दोनों ही परिस्थितियों में यदि प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूटता है, तो बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है और बाढ़ की स्थिति पैदा कर सकता है।

बर्फबारी के बदलते पैटर्न ने बढ़ाई चिंता

उन्होंने हिमाचल में बदलते बर्फबारी के पैटर्न को भी ग्लेशियरों के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार पिछले कुछ दशकों में बर्फबारी के समय और स्वरूप में बदलाव देखा गया है। सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बर्फ पड़ने और मार्च-अप्रैल में बर्फबारी होने की घटनाएं ग्लेशियरों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।

ग्लेशियर के लिए बर्फ का समय पर जमा होना और उसका धीरे-धीरे पिघलना महत्वपूर्ण है। यदि बर्फबारी के सामान्य चक्र में बदलाव आता है तो ग्लेशियर के मास बैलेंस यानी बर्फ के जमा होने और पिघलने के बीच संतुलन पर असर पड़ सकता है। इससे ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रक्रिया तेज होने के साथ ग्लेशियल झीलों के विकास का खतरा भी बढ़ सकता है।

हिमाचल के पांच प्रमुख नदी बेसिनों पर निगरानी

डॉ. रंधावा ने कहा कि हिमाचल प्रदेश हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्लेशियर और उससे जुड़ी आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील है। हिमाचल में मुख्य रूप से पांच प्रमुख नदी बेसिन—व्यास, रावी, चिनाब, यमुना और सतलुज—हैं। व्यास, रावी और चिनाब नदियों का उद्गम हिमाचल प्रदेश से जुड़ा है, जबकि सतलुज नदी का उद्गम तिब्बत, चीन में है।

उन्होंने बताया कि 1993 के आसपास सैटेलाइट डेटा के आधार पर हिमाचल और चीन से जुड़े बेसिनों का अध्ययन किया गया था। उस समय करीब 32 झीलों की पहचान की गई थी। इसके बाद लगातार सैटेलाइट और अंतरिक्ष आधारित डेटा की मदद से ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी की जाती रही है। विशेष रूप से सतलुज बेसिन में अप्रैल से नवंबर तक नियमित निगरानी की जाती रही, ताकि ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों में किसी तरह की असामान्य गतिविधि या बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सके।

हिमालय में भूकंपीय खतरा भी गंभीर

डॉ. रंधावा ने हिमालय क्षेत्र में भूकंप के खतरे की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि हिमालय को भूकंपीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है और यहां बड़े भूकंप आने की क्षमता मौजूद है। ग्लेशियरों, हिमनद झीलों, भूस्खलन और भूकंप जैसे प्राकृतिक खतरों के एक साथ मौजूद होने के कारण हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन और निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। सैटेलाइट डेटा, जमीनी सर्वेक्षण और आधुनिक तकनीक के जरिए ग्लेशियरों तथा ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों की समय रहते पहचान की जाए तो संभावित आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए बेहतर तैयारी की जा सकती है। डॉ. रंधावा ने चेताया कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान आने वाले वर्षों में ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। ऐसे में हिमाचल समेत पूरे हिमालय क्षेत्र में नियमित मैपिंग, निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा। 

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