जबलपुर में टैंकों के नवीनीकरण की नई परियोजना का शिलान्यास, भारतीय सेना को मिलेगी मजबूती

खबर सार :-

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जबलपुर में 472 करोड़ रुपये की टैंक नवीनीकरण परियोजना का शिलान्यास किया। परियोजना से हर साल 80 अतिरिक्त टैंकों के नवीनीकरण की क्षमता विकसित होगी।
राजनाथ सिंह ने किया नई परियोजना का शिलान्यास

खबर विस्तार : -

जबलपुरः रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को जबलपुर में टैंकों के नवीनीकरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परियोजना का शिलान्यास किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारतीय सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है और उसकी जरूरतें भी उसी अनुरूप व्यापक हैं। उन्होंने कहा कि जमीनी युद्ध में टी-72 और टी-90 संस्करण के टैंक भारतीय सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और ये टैंक देश की सीमाओं पर सुरक्षा की मजबूत दीवार के रूप में काम कर रहे हैं।

आत्मनिर्भर भारत के तहत हो रहे प्रयास

रक्षा मंत्री ने कहा कि बदलती तकनीक और युद्ध के बदलते स्वरूप के बावजूद जमीनी लड़ाई में टैंकों की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। बल्कि टैंकों की भूमिका लगातार विकसित हो रही है। आधुनिक युद्ध में ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और अन्य अत्याधुनिक प्रणालियों का महत्व बढ़ा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि टैंकों की आवश्यकता खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार टैंकों को भी तकनीकी रूप से उन्नत और अधिक सक्षम बनाया जा रहा है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत आज दुनिया के सामने एक अलग पहचान बना रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया भारत को देखने का अपना नजरिया बदल रही है और इसके पीछे आत्मनिर्भर भारत के लिए किए जा रहे लगातार प्रयास महत्वपूर्ण हैं। रक्षा मंत्री के मुताबिक, भारत का रक्षा क्षेत्र अब तेजी से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है और पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में हुए बदलाव इसके प्रमाण हैं।

रक्षा निर्यात की हुई वृद्धि

उन्होंने घरेलू रक्षा उत्पादन के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2014 में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन लगभग 46,000 करोड़ रुपये था। उस समय देश में करीब 46,000 करोड़ रुपये के हथियार और रक्षा उपकरणों का उत्पादन होता था। अब यह आंकड़ा बढ़कर रिकॉर्ड 1.77 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। उन्होंने इसे भारत की रक्षा निर्माण क्षमता में महत्वपूर्ण बदलाव बताया।

रक्षा मंत्री ने रक्षा निर्यात में हुई वृद्धि को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में भारत का रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ रुपये से कम था, जबकि आज यह रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। उनके अनुसार, भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार नहीं रहा, बल्कि दुनिया भारत को एक विनिर्माण शक्ति, प्रौद्योगिकी साझेदार और विश्वसनीय रक्षा साझेदार के रूप में भी देख रही है।

जबलपुर में शुरू की जा रही परियोजना के बारे में राजनाथ सिंह ने बताया कि इसके तहत हर साल 80 टैंकों के नवीनीकरण की अतिरिक्त क्षमता विकसित की जाएगी। परियोजना पूरी होने के बाद भारी वाहन कारखाना (एचवीएफ), अवाडी की 150 टैंकों की क्षमता और वाहन कारखाना जबलपुर की 80 टैंकों की क्षमता को मिलाकर हर साल कुल 230 टैंकों का नवीनीकरण किया जा सकेगा।

भारतीय युवाओं में कौशल की कमी नहीं

उन्होंने कहा कि इस क्षमता के बढ़ने से भारतीय सेना को उसकी जरूरत के अनुसार समय पर नवीनीकृत टैंक उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। रक्षा उपकरणों के रखरखाव और नवीनीकरण की प्रक्रिया सेना की परिचालन क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में देश के भीतर टैंकों के नवीनीकरण की अतिरिक्त क्षमता विकसित होने से सैन्य तैयारियों को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

राजनाथ सिंह ने बताया कि इस परियोजना की लागत 472 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि परियोजना में स्थानीय प्रतिभा और तकनीकी कार्यबल को भी अवसर मिलेगा। रक्षा मंत्री ने युवाओं की क्षमता पर जोर देते हुए कहा कि भारतीय युवाओं में कौशल की कमी नहीं है। जरूरत उन्हें अवसर, आधुनिक तकनीक और सही पारिस्थितिकी तंत्र उपलब्ध कराने की है। जब युवाओं को ये तीनों चीजें मिलेंगी, तो वे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

रक्षा मंत्री ने भारी वाहन कारखाने के योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि पिछले 40 वर्षों से भारी वाहन कारखाना भारतीय सेना के लिए टैंकों की आपूर्ति करता रहा है। इस अवधि में कारखाने ने सेना को करीब 4,400 टैंकों की आपूर्ति की है। उन्होंने इसे देश और कारखाने के लिए गर्व का विषय बताया। उनके अनुसार, ये टैंक आज भी देश की सीमाओं पर तैनात हैं और दुश्मन के खिलाफ भारतीय सैनिकों की ताकत तथा मनोबल का प्रतीक बने हुए हैं।

पुराने प्लेटफॉर्म की विकसित होगी क्षमता

राजनाथ सिंह ने आधुनिक युद्ध में अलग-अलग सैन्य प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण किसी एक सैन्य प्लेटफॉर्म को दूसरे का विकल्प मानने का नहीं है। देश को ड्रोन भी चाहिए, मिसाइल भी, तोपखाना भी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता भी और ऊर्जा हथियार भी। इसके साथ-साथ आधुनिक तकनीक से लैस नवीनीकृत टैंकों की भी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि सवाल यह तय करने का नहीं है कि सेना को टैंक चाहिए या ड्रोन। आवश्यकता इस बात की है कि सैनिकों के पास टैंक और ड्रोन दोनों हों तथा उनके बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो। आधुनिक युद्ध में विभिन्न प्रणालियों का एक साथ प्रभावी इस्तेमाल सैन्य क्षमता को और मजबूत कर सकता है।

रक्षा मंत्री ने विश्वास जताया कि जबलपुर में स्थापित होने वाली नई सुविधा इसी व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएगी। उन्होंने कहा कि टैंकों का आधुनिकीकरण केवल पुराने प्लेटफॉर्म को दोबारा इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती युद्ध परिस्थितियों के अनुरूप उनकी क्षमता विकसित करना भी इसका हिस्सा है।

भविष्य के लिए बेहतर

जबलपुर में परियोजना का शिलान्यास ऐसे समय में हुआ है जब भारत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। घरेलू रक्षा उत्पादन में वृद्धि, रक्षा निर्यात का विस्तार और सैन्य प्लेटफॉर्म के आधुनिकीकरण को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। नई परियोजना से टैंकों के नवीनीकरण की क्षमता बढ़ने के साथ स्थानीय स्तर पर तकनीकी रोजगार और कौशल विकास के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर, जबलपुर की यह परियोजना भारतीय सेना के टैंक बेड़े के नवीनीकरण और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आई है। परियोजना पूरी होने के बाद हर साल 80 अतिरिक्त टैंकों के नवीनीकरण की क्षमता विकसित होगी, जिससे सेना को आधुनिक और परिचालन के लिए तैयार टैंक समय पर उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है। रक्षा मंत्री के अनुसार, भविष्य की सैन्य शक्ति टैंक, ड्रोन, मिसाइल और अन्य आधुनिक प्रणालियों के बेहतर समन्वय पर आधारित होगी।

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