ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका: अमेरिकी अदालत का आदेश, गलत तरीके से डिपोर्ट किए गए भारतीय नागरिक को तुरंत वापस बुलाया जाए

खबर सार :-
यह फैसला अमेरिकी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आव्रजन जैसे संवेदनशील मामलों में भी न्यायिक आदेश सर्वोपरि हैं। फ्रांसिस्को डी’कोस्टा को वापस बुलाने का निर्देश न केवल उनके अधिकारों की रक्षा है, बल्कि यह भविष्य में प्रशासनिक मनमानी पर भी मजबूत अंकुश लगाएगा।

ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका: अमेरिकी अदालत का आदेश, गलत तरीके से डिपोर्ट किए गए भारतीय नागरिक को तुरंत वापस बुलाया जाए
खबर विस्तार : -

US Court Big Decision: अमेरिका की एक संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन के समय हुई एक बड़ी आव्रजन कार्रवाई को गैर-कानूनी करार देते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे एक भारतीय मूल के नागरिक फ्रांसिस्को डी’कोस्टा को दोबारा अमेरिका वापस लाने की व्यवस्था करें, जिन्हें स्पष्ट न्यायिक आदेश के बावजूद भारत भेज दिया गया था। अदालत ने इसे न्यायिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन बताया।

जानें क्या है पूरा मामला

टेक्सास के दक्षिणी जिले की अमेरिकी जिला अदालत ने 9 जनवरी को जारी अपने आदेश में कहा कि फ्रांसिस्को डी’कोस्टा को 20 दिसंबर 2025 को अमेरिका से हटाया गया, जबकि उन्हें न डिपोर्ट करने का स्टे ऑर्डर इससे करीब तीन घंटे पहले ही जारी हो चुका था। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसी सुबह उसने डी’कोस्टा की याचिका पर अधिकार क्षेत्र ग्रहण कर लिया था और सरकार को बिना अदालत की अनुमति के उन्हें देश से बाहर न भेजने का निर्देश दिया था।

न्यायिक आदेश की अवहेलना पर सख्त रुख

कोर्ट के मुताबिक, अदालत के निर्देशों के बावजूद डी’कोस्टा को तुर्किश एयरलाइंस की फ्लाइट में बैठा दिया गया, जो उसी दिन दोपहर 2:55 बजे ह्यूस्टन से रवाना हुई। इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) द्वारा दाखिल मेमोरेंडम से यह भी सामने आया कि अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय, आईसीई अधिकारी और हिरासत केंद्र को फ्लाइट के उड़ान भरने से पहले ही स्टे ऑर्डर की जानकारी थी।

“यह गलती नहीं, गैर-कानूनी कार्रवाई”

सरकार ने अदालत में दलील दी कि यह सब गलती से हुआ, लेकिन जज ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हटाने का इरादा चाहे जो भी रहा हो, तथ्य यह है कि निर्वासन गैर-कानूनी था और यही सबसे अहम बिंदु है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि न्यायिक आदेश की अवहेलना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

डी’कोस्टा की पृष्ठभूमि और कानूनी लड़ाई

फ्रांसिस्को डी’कोस्टा भारत के मूल निवासी हैं और वर्ष 2009 से अमेरिका में रह रहे थे। अक्टूबर 2025 में एक आव्रजन न्यायाधीश ने उन्हें स्वेच्छा से अमेरिका छोड़ने की अनुमति दी थी। हालांकि, बाद में उन्होंने वकील की मदद से अपने मामले को फिर से खोलने की याचिका दायर की। इसमें उन्होंने तर्क दिया कि भारत की परिस्थितियां बदल चुकी हैं और ईसाई धर्म अपनाने के कारण उन्हें वहां उत्पीड़न का खतरा है।

याचिका और कानून की पेचीदगियां

फेडरल नियमों के तहत, याचिका दायर करते ही उनका स्वैच्छिक प्रस्थान आदेश स्वतः अंतिम निष्कासन आदेश में बदल गया। अदालत ने माना कि इमिग्रेशन जज ने स्टे का अनुरोध खारिज कर दिया था, लेकिन डी’कोस्टा को हटाए जाने तक पुनर्विचार याचिका पर अंतिम फैसला नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में उन्हें हटाना उनके कानूनी अधिकारों को छीनने जैसा है और यह न्याय की मूल भावना के खिलाफ है।

भारत से केस लड़ने की दलील भी खारिज

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि डी’कोस्टा भारत से ही अपनी कानूनी लड़ाई जारी रख सकते हैं, इसलिए उन्हें वापस लाने की जरूरत नहीं है। अदालत ने इस दलील को भी अस्वीकार करते हुए कहा कि गलत तरीके से हटाए जाने से पहले जिस स्थिति में मामला था, उसी स्थिति में सुनवाई के लिए उनकी वापसी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

अदालत ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक सर्वसम्मत फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी विदेशी नागरिक को अदालत के आदेश के खिलाफ गैर-कानूनी रूप से डिपोर्ट किया जाता है, तो उसे वापस बुलाना न केवल उचित बल्कि आवश्यक उपाय है।

सरकार को सख्त निर्देश

अंत में अदालत ने अमेरिकी सरकार को आदेश दिया कि वह डी’कोस्टा की जल्द से जल्द अमेरिका वापसी सुनिश्चित करे। साथ ही पांच दिनों के भीतर यह बताने को कहा गया कि इस आदेश को लागू करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जाएंगे।

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