नई दिल्ली : इंटरनेट की दुनिया में जिन्हें हम और आप अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक मासूम जरिया समझते हैं, वही रंग-बिरंगे इमोजी (Emojis) अब साइबर अपराध की काली दुनिया के नए कोड वर्ड बन चुके हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हैकर्स अब पकड़े जाने से बचने के लिए शब्दों के बजाय इन चित्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं। खतरे का विश्लेषण करने वाली कंपनी 'फ्लैशपॉइंट' की रिपोर्ट के मुताबिक, टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय अपराधी अपनी साजिशों को छिपाने के लिए एक पूरी 'विजुअल डिक्शनरी' तैयार कर चुके हैं।
अतीत में साइबर अपराधी डार्क वेब के जटिल मंचों पर लंबी चर्चाएं करते थे, लेकिन अब समय बदल गया है। आज का हैकर अधिक फुर्तीला है। सुरक्षा विशेषज्ञ अलाना क्रोकर का कहना है कि इमोजी अब केवल सजावट नहीं, बल्कि 'सिग्नलिंग लेयर' बन गए हैं। एक 'मनी बैग' का इमोजी सफल भुगतान को दर्शाता है, तो 'चाबी' का चिह्न चोरी किए गए लॉगिन क्रेडेंशियल या डेटा एक्सेस की ओर इशारा करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन चिह्नों को समझने के लिए किसी खास भाषा के ज्ञान की जरूरत नहीं होती, जिससे वैश्विक स्तर पर अलग-अलग देशों के अपराधी आसानी से तालमेल बिठा लेते हैं।
ज्यादातर एंटी-वायरस और सुरक्षा सॉफ्टवेयर 'टेक्स्ट' यानी लिखे हुए शब्दों को पहचानने के लिए बने हैं। जब कोई अपराधी 'Stolen Credit Card' लिखता है, तो सुरक्षा सिस्टम तुरंत उसे पकड़ लेते हैं। लेकिन जब इसी बात को कार्ड और आग के इमोजी के साथ कोड में लिखा जाता है, तो पारंपरिक 'कीवर्ड फिल्टर' फेल हो जाते हैं। एलेग्रो सॉल्यूशंस की सीईओ करेन वॉल्श के अनुसार, हैकर्स ठीक उसी तरह फिल्टर से बच रहे हैं जैसे आम लोग सोशल मीडिया पर राजनीतिक प्रतिबंधों से बचने के लिए प्रतीकों का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी 'विजुअल शॉर्टहैंड' है जिसे केवल गिरोह के सदस्य ही समझ पाते हैं।
यह मामला केवल बातचीत तक सीमित नहीं है। हाल ही में पाकिस्तान से जुड़े एक हैकिंग ग्रुप के 'डिस्कॉमोजो' अभियान ने सबको चौंका दिया। यहाँ इमोजी का उपयोग 'मशीन कमांड' की तरह किया गया:
पॉलीग्राफ एआई के सीईओ याकूब रहीमोव ने इसे "लो-एंट्रोपी एनकोडिंग" का नाम दिया है, जो खुलेआम घूमते हुए भी नजरों से ओझल रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल शब्दों की निगरानी काफी नहीं है। साइबर सुरक्षा टीमों को अब 'इमोजी बोलियों' (Emoji Dialects) को समझने और उनके व्यवहार पर नजर रखने की जरूरत है। जिस तरह इंसान के बात करने का तरीका उसकी पहचान होता है, वैसे ही इन चिह्नों के इस्तेमाल का पैटर्न भी हैकर्स के फिंगरप्रिंट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
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