शाहपुराः राजस्थान के शाहपुरा में स्थित रामनिवास धाम इन दिनों आस्था, श्रद्धा और उत्सव के रंगों में सराबोर है। यहां आयोजित विश्वप्रसिद्ध फूलडोल महोत्सव के दौरान दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। यह महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और कृतज्ञता का अनूठा प्रतीक भी बन चुका है। महोत्सव के दौरान यहां एक ऐसी परंपरा देखने को मिलती है, जो लोगों के विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव को गहराई से दर्शाती है—परिवार में संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर नवजात बच्चे को मिश्री से तौलने की परंपरा।
रामनिवास धाम में स्थित पवित्र स्तंभजी के समक्ष यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। श्रद्धालु जब किसी विशेष मनोकामना के साथ धाम में पहुंचते हैं तो वे स्तंभजी के पास मोली बांधकर अपनी मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना यहां अवश्य स्वीकार होती है। जब किसी की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह श्रद्धालु दोबारा धाम पहुंचकर स्तंभजी के सामने सिर झुकाकर आभार व्यक्त करता है। विशेष रूप से जब परिवार में संतान सुख की प्राप्ति होती है, तब भक्त अपने नवजात बच्चे को मिश्री से तौलकर अपनी खुशी और कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
इस परंपरा के अनुसार बच्चे को एक तराजू में बैठाया जाता है और दूसरी ओर धीरे-धीरे मिश्री डाली जाती है, जब तक कि दोनों पलड़े बराबर न हो जाएं। इसके बाद उसी मिश्री को प्रसाद के रूप में वहां उपस्थित श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। यह दृश्य न केवल परिवार के लिए बल्कि वहां मौजूद सभी श्रद्धालुओं के लिए भी बेहद भावुक और आनंददायक होता है। मिश्री की मिठास जैसे पूरे वातावरण में घुल जाती है और मंदिर परिसर खुशी और आस्था के माहौल से भर उठता है।
रामस्नेही संप्रदाय के संत नवनीध राम महाराज बताते हैं कि संप्रदाय के आद्य संस्थापक स्वामी रामचरणजी महाराज के पावन स्तंभजी के समक्ष मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। उनका कहना है कि श्रद्धालु जब रामद्वारा आते हैं तो स्तंभजी के सामने श्रद्धा से मोली बांधकर अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं। जब उनकी इच्छा पूर्ण हो जाती है तो वे पुनः यहां आकर धन्यवाद अर्पित करते हैं। संतान प्राप्ति के बाद बच्चे को मिश्री से तौलने की परंपरा इसी विश्वास और श्रद्धा का प्रतीक बन चुकी है।
इन दिनों चल रहे फूलडोल महोत्सव में प्रतिदिन कई ऐसे परिवार धाम पहुंच रहे हैं, जिनकी मन्नतें पूरी हुई हैं। सुबह से लेकर शाम तक स्तंभजी के समक्ष श्रद्धालुओं की कतारें लगी रहती हैं। कोई अपने नवजात शिशु को गोद में लेकर आता है तो कोई छोटे बच्चों को लेकर इस विशेष परंपरा को निभाने के लिए पहुंचता है। जैसे ही बच्चे को तराजू में बैठाया जाता है और दूसरी ओर मिश्री डाली जाती है, परिवार के चेहरे पर खुशी और संतोष की झलक साफ दिखाई देती है। यह पल उनके लिए जीवन भर की याद बन जाता है।
फूलडोल महोत्सव के दौरान इस परंपरा ने धाम की आस्था को और भी मजबूत बना दिया है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि भगवान के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। हर दिन दर्जनों परिवार अपने बच्चों को मिश्री से तौलकर इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। मंदिर परिसर में बच्चों की किलकारियां, भक्तों के भजन और प्रसाद की मिठास मिलकर एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण तैयार कर देते हैं।
इसी क्रम में शाहपुरा के पत्रकार मूलचंद पेसवानी का परिवार भी रामनिवास धाम पहुंचा। परिवार में देवेंद्र पेसवानी के पुत्र जन्म की खुशी में उन्होंने अपने नन्हे बेटे विनायक को स्तंभजी के समक्ष मिश्री से तौलकर आस्था अर्पित की। इस अवसर पर परिवार के सभी सदस्यों ने प्रभु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और कहा कि यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन की खुशियों को भगवान के चरणों में समर्पित करने का एक सुंदर माध्यम है। मिश्री को बाद में प्रसाद के रूप में वहां मौजूद श्रद्धालुओं में बांटा गया।
मिश्री की मिठास और बच्चों की किलकारियों के बीच यह परंपरा हर साल लोगों के विश्वास को और गहरा करती जा रही है। यही कारण है कि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इस महोत्सव का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक रहते हैं और अपने जीवन की खुशियों को प्रभु के चरणों में अर्पित कर आत्मिक संतोष प्राप्त करते हैं।
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