शाहपुरा: राजस्थान के शाहपुरा में नवसंवत्सर के पावन अवसर पर आयोजित धार्मिक आयोजन इस बार एक बड़े बयान के चलते चर्चा का केंद्र बन गया। हिंदू नववर्ष समाजोत्सव समिति के तत्वावधान में निकली भव्य कलश यात्रा और उसके बाद आयोजित धर्मसभा ने पूरे शहर को धार्मिक उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। लेकिन इस आयोजन में छिंदवाड़ा से पधारी साध्वी सरस्वती के एक बयान ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी।
शहर के हायर सेकेंडरी स्कूल मैदान में आयोजित इस विशाल कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। बैंड-बाजों की गूंज, डीजे की धुन और हाथों में लहराते भगवा ध्वजों के साथ निकली कलश यात्रा ने शहर के प्रमुख मार्गों को आस्था के रंग में रंग दिया। “जय श्रीराम” के उद्घोषों के बीच श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण किए चल रही थीं, जबकि युवा और बुजुर्ग भी पूरे जोश के साथ इस आयोजन का हिस्सा बने।
धर्मसभा के दौरान साध्वी सरस्वती ने शाहपुरा के नाम को लेकर एक बड़ा बयान देते हुए इसे बदलने की मांग रखी। उन्होंने कहा कि “शाहपुरा” नाम में ‘शाह’ शब्द हमारी संस्कृति और परंपरा से मेल नहीं खाता। उनके अनुसार, यह भूमि किसी शासक विशेष की नहीं, बल्कि रामभक्तों और धर्मप्रेमियों की पावन धरती है। उन्होंने सुझाव दिया कि शहर का नाम बदलकर “रामस्नेही नगर” रखा जाना चाहिए, जिससे क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान और सशक्त हो सके।
साध्वी ने इस मांग को आगे बढ़ाते हुए भजनलाल शर्मा से अपील की कि वे इस दिशा में सकारात्मक निर्णय लें। उन्होंने तर्क दिया कि क्षेत्र में रामस्नेही संप्रदाय के अनुयायियों की बड़ी संख्या निवास करती है, ऐसे में “रामस्नेही नगर” नाम स्थानीय भावनाओं के अधिक अनुरूप होगा। उनके इस बयान के बाद सभा में मौजूद लोगों के बीच चर्चा और हलचल तेज हो गई, वहीं यह मुद्दा शहरभर में बहस का विषय बन गया।
अपने संबोधन में साध्वी सरस्वती ने सामाजिक जागरूकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में केवल धार्मिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि आत्मरक्षा का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है। विशेष रूप से महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “हर माता-बहन को शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र का ज्ञान भी होना चाहिए।” उनके इस वक्तव्य ने सभा में उपस्थित महिलाओं और युवाओं के बीच एक अलग प्रकार की ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया।
इसके साथ ही उन्होंने देश की आंतरिक चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत को सबसे बड़ा खतरा बाहरी शक्तियों से नहीं, बल्कि भीतर मौजूद स्वार्थी तत्वों से है। उन्होंने समाज को ऐसे तत्वों से सतर्क रहने और एकजुट रहने का आह्वान किया। उनके भाषण में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आए।
धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों को छूते हुए साध्वी सरस्वती ने अयोध्या, मथुरा और काशी का उल्लेख करते हुए कहा कि “अयोध्या तो अभी केवल झांकी है, मथुरा और काशी बाकी हैं।” हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी धर्म विशेष के खिलाफ बोलना नहीं है, बल्कि इतिहास और आस्था से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है।
कार्यक्रम की शुरुआत गोमाता पूजन और भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुई। इसके बाद भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों ने माहौल को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया। पूरे मैदान को तिरंगे और भगवा ध्वजों से सजाया गया था, जो राष्ट्रभक्ति और धर्मभाव का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहा था।
इस अवसर पर समाजोत्सव समिति के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद जोशी, संगीता बहन (ब्रह्माकुमारी), डॉ. परमेश्वर कुमावत सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. परमेश्वर कुमावत ने प्रभावी ढंग से किया।
कलश यात्रा और धर्मसभा में महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की बड़ी भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि शाहपुरा में धर्म और संस्कृति के प्रति आस्था आज भी जीवंत है। नवसंवत्सर का यह आयोजन जहां एक ओर धार्मिक चेतना का संचार करता नजर आया, वहीं दूसरी ओर साध्वी सरस्वती के बयान ने शहर की राजनीति और सामाजिक विमर्श को नई दिशा दे दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि “रामस्नेही नगर” नामकरण की यह मांग किस दिशा में आगे बढ़ती है और सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है।
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