जेनेरिक पर भारी 'ब्रांडेड' का मोह: कमीशन के खेल में दम तोड़ रहे जन औषधि केंद्र

खबर सार :-
आज जन औषधि दिवस है। यह प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना है। काफी प्रचार एवं प्रसार के बाद भी इस योजना को चिकित्सकों द्वारा प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। इस कारण सस्ती दवाओं को देने वाले इन जन औषधि केंद्रों की स्थिति काफी खराब होने लगी है।

जेनेरिक पर भारी 'ब्रांडेड' का मोह: कमीशन के खेल में दम तोड़ रहे जन औषधि केंद्र
खबर विस्तार : -

झांसीः आज जन औषधि दिवस के अवसर पर जिले में प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना के तहत चल रहे जन औषधि केंद्रों की स्थिति पर चिंता जताई जा रही है। यह योजना सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं को आम जनता तक पहुँचाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाओं के प्रयोग और पर्चे पर केवल ब्रांडेड दवाएं लिखे जाने के कारण इन केंद्रों की उपयोगिता और संचालन पर संकट खड़ा हो गया है।

एक्सपायर हो रहीं दवाएं

जन औषधि केंद्रों के संचालक बताते हैं कि चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाओं की जगह ब्रांडेड दवाओं के पर्चे लिखे जाने से केंद्रों पर रखी दवाएं एक्सपायर हो जाती हैं। इससे केंद्रों को प्रतिवर्ष लगभग ₹500,000 तक का नुकसान उठाना पड़ता है। इसके कारण कई केंद्रों पर स्टॉक सीमित रखा जाता है, जिससे मरीजों को आवश्यक दवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। केंद्र संचालकों का आरोप है कि कमीशन खोरी के कारण चिकित्सक सिर्फ बड़ी कंपनियों की ब्रांडेड दवाओं का प्रयोग करते हैं, जबकि जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं के समान प्रभावकारी होने के बावजूद 40 से 50 प्रतिशत कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं।

लाइसेंस सरेंडर करने की स्थिति में संचालक

सर्वे और सूत्रों के अनुसार, जिले में शुरू में लगभग 25 जन औषधि केंद्र खोले गए थे, जिनमें से फिलहाल केवल 15 केंद्र ही चल रहे हैं। अन्य केंद्रों के संचालक लाइसेंस सरेंडर करने की स्थिति में हैं। केन्द्रों के संचालन में गिरावट के कारण योजना की मूल उद्देश्य—सस्ती दवाओं की उपलब्धता—असफल हो रही है। दिवाकर त्रिपाठी, एक जन औषधि केंद्र संचालक, का कहना है कि सरकारी चिकित्सकों को निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे पर्चे पर ब्रांडेड दवा के स्थान पर बेसिक साल्ट लिखें। इससे न केवल केंद्र संचालकों को फायदा होगा, बल्कि मरीज भी जेनेरिक दवाओं की सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाइयों का लाभ उठा सकेंगे।

सहायक आयुक्त, खाद्य एवं औषधि विभाग, झांसी, दीपक कुमार ने बताया कि जिले में फिलहाल केवल 15 जन औषधि केंद्र ही सक्रिय हैं और कई संचालकों ने अपना लाइसेंस सरेंडर कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि जिले में 10 और जन औषधि केंद्र खोले जाने की योजना है, ताकि लोगों तक दवाओं की सुलभता बढ़ाई जा सके। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सरकार केंद्रों की स्थिति सुधारने के लिए चिकित्सकों और केंद्र संचालकों दोनों के बीच समन्वय बढ़ाने पर काम कर रही है।

सरकार को देने होंगे निर्देश

विशेषज्ञों और केंद्र संचालकों का कहना है कि अगर चिकित्सक जेनेरिक दवाओं को अपनाने में आगे नहीं आए, तो कई केंद्र बंद हो जाएंगे और योजना का उद्देश्य प्रभावित होगा। इसके अलावा, मरीजों को सस्ती दवाएं मिलने के बजाय उन्हें महंगी ब्रांडेड दवाओं पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे आम जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

जन औषधि केंद्रों का उद्देश्य न केवल दवा उपलब्ध कराना है, बल्कि जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना भी है। केन्द्रों पर दवाओं की कमी और एक्सपायर होने की समस्या दूर करने के लिए सरकार को चिकित्सकों को स्पष्ट निर्देश जारी करने होंगे और उनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी होगी कि वे पर्चों पर जेनेरिक दवाओं का ही उल्लेख करें। यह कदम केंद्र संचालकों की आर्थिक स्थिति को स्थिर करेगा और मरीजों को कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवाओं की सुविधा देगा।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह योजना सही तरीके से लागू हो और चिकित्सक इसके महत्व को समझें, तो यह न केवल सस्ती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी, बल्कि जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की संतुष्टि भी बढ़ाएगी। जन औषधि केंद्रों के माध्यम से सरकार ने स्वास्थ्य सेवा में आम जनता तक पहुँच बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन इसे पूरी सफलता दिलाने के लिए चिकित्सकों और केंद्र संचालकों के बीच तालमेल और गंभीर दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

जन औषधि दिवस पर यह योजना स्वास्थ्य सेवा में सुधार और सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाओं के प्रचलन और केंद्र संचालकों की समस्याओं के कारण इसका वास्तविक लाभ अब तक जनता तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाया है। सरकार और संबंधित विभागों को मिलकर इसे सुदृढ़ बनाना होगा।
 

अन्य प्रमुख खबरें