प्रयागराज: उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था और प्रशासनिक गलियारों में एक बहुत बड़ा भूचाल आने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने राज्य के भीतर पैर पसार चुके प्रशासनिक भ्रष्टाचार और फाइलों के दबाने के खेल पर अब तक की सबसे तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधे तौर पर एक बेहद कड़ा और गंभीर आग्रह किया है। हाईकोर्ट का कहना है कि उत्तर प्रदेश में अब वह समय आ चुका है जब विभागों में होने वाली गड़बड़ियों, अंतहीन देरी और भ्रष्टाचार के लिए केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाना बंद किया जाए, बल्कि शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों और बड़े नौकरशाहों को इसके लिए सीधे तौर पर आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार (criminal liability) माना जाए।
यह ऐतिहासिक और कड़ा रुख न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने अपनाया है। कोर्ट ने सूबे की पूरी व्यवस्था को आईना दिखाते हुए 'उच्च ज़िम्मेदारी' (principle of higher responsibility) का सिद्धांत लागू करने की वकालत की है। इसके तहत प्रशासनिक पदानुक्रम में सबसे ऊपर बैठे अधिकारियों को उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की चूकों, घोटालों और लापरवाही के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाने की बात कही गई है।
अदालत इस मामले को लेकर कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अपने 16 पन्नों के विस्तृत आदेश में सूबे के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को एक अत्यंत कड़ा निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि इस फैसले की प्रमाणित प्रति को किसी दफ्तर की फाइलों में दफन करने के बजाय, सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष व्यक्तिगत अवलोकन के लिए प्रस्तुत किया जाए। कोर्ट चाहता है कि शासन के सर्वोच्च स्तर पर इस बात का आत्ममंथन हो कि आखिर राज्य में 'शून्य सहनशीलता' (zero tolerance) की नीति के दावों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर नौकरशाही इतनी बेलगाम क्यों है।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने देश और प्रदेश को खोखला कर रहे संस्थागत पतन के दो बेहद खतरनाक रूपों को विस्तार से रेखांकित किया है।
1. मन का भ्रष्टाचार (Corruption of Mind): कोर्ट के अनुसार, यह वह मानसिक बीमारी है जिसके तहत सरकारी अफसर अपनी आधिकारिक कुर्सी और ताकत की आड़ में निजी स्वार्थों को साधने के लिए सरकारी नियमों और निर्णयों की पूरी प्रक्रिया को ही जानबूझकर तोड़-मरोड़ देते हैं।
2. पैसे का भ्रष्टाचार (Corruption of Money): इसके तहत जनता की सेवा के लिए बने सार्वजनिक पदों को केवल और केवल व्यक्तिगत आर्थिक लाभ और तिजोरियां भरने का जरिया बना लिया जाता है।
जस्टिस दिवाकर ने साफ शब्दों में कहा कि बड़े अफ़सरों को उनके मातहतों के आचरण के लिए जवाबदेह ठहराया जाना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि सरकारी सेवाओं को आम जनता तक ईमानदारी से पहुँचाना उनकी पेशेवर ज़िम्मेदारी है। अगर उनके विभाग में कोई बड़ा घोटाला, धोखाधड़ी, रिकॉर्ड को नष्ट करने या सरकारी आदेशों की अवमानना का कृत्य होता है, तो वरिष्ठ अधिकारियों को आपराधिक दायरे में लाया जाना चाहिए। इसके बिना accountability of senior bureaucrats in up (यूपी में वरिष्ठ नौकरशाहों की जवाबदेही) को सुनिश्चित करना नामुमकिन है।
यह पूरा मामला अवनीश कुमार अग्रवाल नामक एक व्यवसायी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने बरेली की एक विशेष अदालत के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने उसके पासपोर्ट के नवीनीकरण (passport renewal) के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) देने से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि कुछ अज्ञात शरारती तत्वों ने सरकारी दफ्तर में आग लगाकर जानबूझकर रिकॉर्ड गायब कर दिए थे।
सुनवाई के दौरान कोर्ट तब दंग रह गया जब यह पता चला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एक एफआईआर की जांच पिछले 20 सालों से यानी दो दशकों से लटकी हुई थी। वहीं दूसरी एफआईआर में भी पूरे 18 साल की देरी के बाद साल 2024 में चार्जशीट दाखिल की गई। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह केवल उसे परेशान करने की साजिश थी और हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने पहले ही इस दंडात्मक कार्यवाही पर रोक लगा रखी है, इसलिए वह पासपोर्ट पाने का हकदार है। हालाँकि, सरकारी वकील ने मामले की गंभीरता का हवाला देकर इसका विरोध करने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने इस अंतहीन देरी को व्यवस्था का मखौल माना।
अदालत ने याद दिलाया कि साल 2023 में 'मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में हाईकोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने सरकार को एक उच्च-स्तरीय समिति (High-Powered Committee) बनाने का निर्देश दिया था। इस समिति का मुख्य काम सरकारी विभागों में होने वाले भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों की समयबद्ध तरीके से जांच सुनिश्चित करना और दिशा-निर्देश तय करना था।
लेकिन कोर्ट तब हैरान रह गया जब उसे बताया गया कि साल 2023 के इस बड़े आदेश के बावजूद, उत्तर प्रदेश शासन ने इस कमेटी का गठन करने में दो साल का समय लगा दिया और अंततः दिसम्बर 2025 में इसका गठन तब हुआ, जब मौजूदा पीठ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद भी उन्होंने तीन महीने तक इस कमेटी की प्रगति रिपोर्ट का इंतज़ार किया, लेकिन शासन की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नौकरशाही के एक बड़े हिस्से की मानसिकता पर सीधा हमला बोला। अदालत ने कहा कि न्यायिक निर्देशों को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा कुछ अफसरों का वह रवैया है जो समावेशी नहीं है। ये अफसर अपनी मनमानी शक्तियों (arbitrary powers) को बनाए रखने को ही अपना अंतिम लक्ष्य मानते हैं। अफसरों के भीतर अपनी इसी अनियंत्रित ताकत को खोने का जो डर है, वही असल में सरकारी दफ्तरों में 'लालफीताशाही' (red-tapism) और फाइलों को लटकाने की मुख्य वजह है।
अदालत ने कहा कि देश का कानून और नियम इसी अनियंत्रित ताकत पर लगाम लगाने के लिए बने हैं। मुख्य सचिव के पद को राज्य प्रशासन की रीढ़ बताते हुए कोर्ट ने कहा कि कैबिनेट के सचिव होने के नाते वे मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार होते हैं, इसलिए उनके प्रतिनिधियों और सरकारी वकीलों से असाधारण सतर्कता (extraordinary vigilance) और संस्थागत जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है।
अदालत ने मामले के सभी गुण-दोषों को परखने के बाद व्यवसायी की याचिका को पूरी तरह स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण, बरेली को सख्त निर्देश जारी किया है कि वे कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिकाकर्ता के पासपोर्ट को तुरंत नवीनीकृत या जारी करें। इसके साथ ही, कोर्ट के रजिस्ट्रार को आदेश दिया गया है कि वे इस फैसले की कॉपी तुरंत मुख्य सचिव को भेजें ताकि शासन स्तर पर accountability of senior bureaucrats in up (यूपी में वरिष्ठ नौकरशाहों की जवाबदेही) को तय करने की प्रक्रिया को मुख्यमंत्री के दिशा-निर्देशन में आगे बढ़ाया जा सके। अब देखना यह है कि इस कड़े आदेश के बाद यूपी की नौकरशाही में क्या बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं।
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