अयोध्याः राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पूर्व मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्रा के हालिया बयान को लेकर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने के फैसले से जुड़े उनके बयान पर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं, जिससे यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
सपा के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने नृपेंद्र मिश्रा के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने पहले खुद स्वीकार किया था कि गोली चलाने का निर्णय प्रशासनिक स्तर पर लिया गया था। भाटी के अनुसार, “नृपेंद्र मिश्रा ने पहले कहा था कि गोली चलाने के आदेश उन्होंने ही दिए थे और यह कोई राजनीतिक फैसला नहीं था। अब वे अपनी ही बातों से पीछे हटते नजर आ रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि सरकार का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता है, लेकिन किस प्रकार बल का प्रयोग किया जाए—यह निर्णय अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है। भाटी ने यह भी आरोप लगाया कि बिना गोली चलाए भी हालात को नियंत्रित किया जा सकता था, लेकिन उस समय प्रशासन ने पर्याप्त तैयारी नहीं की और जल्दबाजी में यह कदम उठा लिया।
वहीं, कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब गोली चलाने का निर्णय लिया गया, तब आदेश देने वाले नृपेंद्र मिश्रा ही थे। उन्होंने कहा कि उस समय कोई अन्य अधिकारी या नेता इस निर्णय के पीछे नहीं था।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता आराधना मिश्रा ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाते हुए कहा कि उस दौर में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने घटनाओं का राजनीतिकरण किया। उन्होंने कहा कि उस समय की परिस्थितियों का उपयोग समाज को धर्म के आधार पर बांटने के लिए किया गया, जिसके प्रभाव आज भी देखने को मिलते हैं।
दरअसल, नृपेंद्र मिश्रा ने शनिवार को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने से जुड़ी घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण निर्णय प्रायः नौकरशाहों द्वारा नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व द्वारा लिए जाते हैं। उनके अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत फैसले राजनीतिक होते हैं, जबकि शेष 10 प्रतिशत में प्रशासनिक अधिकारियों—जैसे गृह सचिव, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक—की सलाह शामिल होती है।
नृपेंद्र मिश्रा ने वर्ष 1992 की घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुलिस कारसेवकों पर गोली न चलाए, जबकि कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी।
उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभव को साझा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल का भी जिक्र किया और बताया कि संकट के समय दोनों नेताओं के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर था।
नृपेंद्र मिश्रा के इस बयान ने अयोध्या की उन ऐतिहासिक और संवेदनशील घटनाओं को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है, जो लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा रही हैं। कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर यह बहस अब और तेज होती दिखाई दे रही है।कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में राजनीतिक निर्णय-लेने की प्रमुख भूमिका को लेकर भी हैं।
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