Film Ikkis Review : निर्देशक श्रीराम राघवन (Sriram Raghavan) की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘इक्कीस’ (ikkis) सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, और इस फिल्म ने दर्शकों को दिल को छूने वाली कहानी, बेहतरीन अभिनय और शानदार वीएफएक्स से चौंका दिया है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के नाती, अगस्त्य नंदा (Agastya Nanda) और अक्षय कुमार (Akshay Kumar) की भांजी, सिमर भाटिया (Simar Bhatia) मुख्य भूमिकाओं में हैं। यदि आप भी इसे देखने का मन बना रहे हैं, तो इस रिव्यू को पढ़कर फिल्म के बारे में जान सकते हैं। फिल्म का सार: ‘इक्कीस’ 1971 के भारत-पाक युद्ध (India-Pakistan War) पर आधारित एक शहादत की कहानी है, जो भावनाओं और रिश्तों के माध्यम से जंग के बाद के दर्द को महसूस कराती है। फिल्म दो समय-सीमाओं में बंटी है, एक हिस्सा 1971 में युद्ध के समय का है, और दूसरा 2021 में जंग के बाद के असर को दिखाता है। फिल्म जंग के दृश्य को शोर-शराबे से दूर रखते हुए दर्शकों को उस तनाव, उलझन और जिम्मेदारी का एहसास कराती है, जो एक युवा अफसर पर युद्ध के दौरान होती है।
कहानी: फिल्म की शुरुआत दिसंबर 1971 के बसंतर युद्ध से होती है, जहां 21 वर्षीय अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) अपने टैंक रेजिमेंट के साथ दुश्मन का सामना करता है। फिल्म युद्ध को एक वीरता की गाथा के रूप में नहीं, बल्कि एक युवा अफसर की मानसिक स्थिति और उस समय आने वाले फैसलों के तनाव के रूप में प्रस्तुत करती है। इस युद्ध में अरुण की वीरता को हम महसूस करते हैं, लेकिन युद्ध की असल कीमत और उसके बाद के खालीपन को फिल्म धीरे-धीरे उजागर करती है।
दूसरे भाग में हम 2021 के समय में आते हैं, जहां दर्शकों को इमोशन और शोक का माहौल महसूस होता है। यहां, धर्मेंद्र (Dharmendra) ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के रूप में नजर आते हैं, जो अपने बेटे अरुण के बलिदान के बाद उसकी यादों में खोए हुए हैं। उनके साथ जयदीप अहलावत का किरदार ब्रिगेडियर ख़्वाजा मोहम्मद नासिर जंग के बाद के प्रभावों को बेहद प्रभावी तरीके से दर्शाता है।

अभिनयः अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के रूप में अपनी भूमिका को बेहतरीन तरीके से निभाया है। वह किसी बड़े हीरो की तरह नहीं, बल्कि एक आम इंसान के रूप में दिखते हैं, जो अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से निभाता है। जयदीप अहलावत और धर्मेंद्र के अभिनय ने फिल्म को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है। खासकर धर्मेंद्र की आँखों में छुपा दर्द और गर्व बहुत कुछ कह जाता है। इसके अलावा, सिमर भाटिया भी अपने छोटे स्क्रीन टाइम के बावजूद प्रभावशाली प्रदर्शन करती हैं। वह किरदार किरण में अरुण के जीवन के उन हिस्सों की झलक दिखाती हैं, जिन्हें अरुण जीने का सपना देखते थे।
वीएफएक्सः फिल्म के वीएफएक्स ने इसे और भी शानदार बना दिया है। युद्ध के दृश्य, खासकर टैंक की लड़ाई के, इतने असल और प्रभावशाली हैं कि दर्शक खुद को युद्ध के माहौल में महसूस करते हैं। वीएफएक्स ने पूरी फिल्म के अनुभव को और अधिक जीवंत और तात्कालिक बना दिया है, जिससे यह दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है।

संगीत और निर्देशनः फिल्म का संगीत और निर्देशन भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है। संगीत की थीम कहानी के साथ पूरी तरह से मेल खाती है, और श्रीराम राघवन का निर्देशन कहानी की गहराई और भावना को बेहद सटीकता से पर्दे पर उतारता है।
‘इक्कीस’ एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं बल्कि उस युद्ध के बाद के खालीपन और दर्द को दर्शाती है, जिसे हमें अपने दिल में समेट कर जीना होता है। यह फिल्म न सिर्फ युद्ध के जज्बे और शहादत को मान देती है, बल्कि हमारे भीतर के इंसान को भी जगाती है।
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