‘बांग्लादेश में संगठित होता हिंदू समाज’
विभाजन की विभीषिका और 1971 के मुक्ति- संग्राम के पश्चात अस्तित्व में आए बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समाज का इतिहास अत्यंत पीड़ादायक रहा है। स्वतंत्रता के समय इस भू-भाग में लगभग 22 प्रतिशत से अधिक हिंदू निवास करते थे, किंतु निरंतर उत्पीड़न, धर्मांतरण, संपत्ति पर कब्ज़े और असुरक्षा की भावना के चलते आज यह आंकड़ा घटकर मात्र 8 प्रतिशत के आसपास सिमट गया है। दशकों तक यह समाज अपने ही घर में दोयम दर्जे के नागरिक की भांति जीवन व्यतीत करने और अपनी सांस्कृतिक पहचान को छिपाने के लिए विवश था।
विगत कुछ समय पूर्व पड़ोसी राष्ट्र में हुए भारी राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता परिवर्तन ने एक बार फिर अल्पसंख्यक समाज को चरम संकट में डाल दिया। उपद्रवियों और कट्टरपंथी ताकतों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मंदिरों, हिंदू व्यापारिक प्रतिष्ठानों और उनके घरों को निशाना बनाया गया। परंतु इस बार एक अभूतपूर्व वैचारिक और व्यावहारिक परिवर्तन देखने को मिला। इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसी विपदा आई, अल्पसंख्यक समाज ने प्राण रक्षा हेतु सीमा पार कर 'पलायन' का मार्ग चुना, किंतु इस बार उन्होंने अपनी माटी न छोड़ने और 'प्रतिरोध' का साहसिक निर्णय लिया।
ढाका के शाहबाग से लेकर चटगांव तक की सड़कों पर जो दृश्य उभरे, वे सामान्य नहीं हैं। लाखों की संख्या में हिंदू युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने भय के आवरण को त्यागकर अपने अधिकारों के लिए हुंकार भरी। बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के आश्रय के, केवल अपनी धार्मिक एवं सामाजिक अस्मिता की रक्षा हेतु इस प्रकार का जन-सैलाब बांग्लादेश के इतिहास में अकल्पनीय था। यह नवजागरण इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि हिंदू समाज अब मूकदर्शक बनकर अत्याचार ,प्रताड़ना एवं अन्याय सहने को कदापि तैयार नहीं है।
सड़कों पर उतरे इस संगठित समाज की मांगें अत्यंत स्पष्ट और पूर्णतः लोकतांत्रिक हैं। वे अल्पसंख्यक मंत्रालय के गठन, हालिया हमलों की त्वरित सुनवाई के लिए ‘फास्ट-ट्रैक ट्रिब्यूनल’ की स्थापना, छीनी गई देव-संपत्ति (मठ-मंदिरों की भूमि) की वापसी और दुर्गा पूजा जैसे महापर्वों पर राष्ट्रीय अवकाश की मांग कर रहे हैं। इस जन-आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी बागडोर नई पीढ़ी के छात्रों और मातृशक्ति के सशक्त हाथों में है। युवाओं का यह अडिग स्वर है कि "यह राष्ट्र हमारा भी है और हम यहाँ प्रथम श्रेणी के नागरिक के रूप में सम्मानपूर्वक रहेंगे।"
पड़ोसी देश के हिंदुओं की इस ऐतिहासिक एकजुटता ने न केवल वहां की अंतरिम सरकार को सोचने पर विवश कर दिया है, अपितु अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और भारत सरकार का भी ध्यान आकृष्ट किया है। भारत के 140 करोड़ नागरिकों की चिंता और कूटनीतिक सक्रियता ने इस विषय को वैश्विक मंच पर गंभीरता से स्थापित किया है।
यह सिद्ध हो चुका है कि ,"संगठन में ही सर्वोपरि शक्ति है।" जब कोई समाज अपने स्वाभिमान, अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा के लिए एकनिष्ठ होकर खड़ा होता है, तो कोई भी सत्ता उसकी उपेक्षा नहीं कर सकती। बांग्लादेश का संगठित होता हिंदू समाज संपूर्ण विश्व के लिए यह संदेश है कि अधिकार कभी गिड़गिड़ाने से प्राप्त नहीं होते, बल्कि अडिग होकर अपना हक़ मांगने और स्वयं को सशक्त करने से ही सुरक्षित रहते हैं।
प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह नेगी
डूटा प्रेसिडेंट
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