Feminine voice in boys: कुछ लड़कों की आवाज लड़कियों जैसी पतली क्यों, जानिए कारण

खबर सार :-
Feminine voice in boys: लड़कों की उम्र 18 साल होने के बाद उनके आवाज में बदलाव होता है। प्राकृतिक रुप से लड़कों की आवाज भारी हो जाती है, लेकिन कुछ लड़कों की आवाज में 18 के बाद भी भारीपन नहीं आता है, यह आपके सेहत से जुड़ा होता है, चलिए इसके बारे में जानते हैं कि इसे कैसे ठीक कर सकते हैं?

Feminine voice in boys: कुछ लड़कों की आवाज लड़कियों जैसी पतली क्यों, जानिए कारण
खबर विस्तार : -

Feminine voice in boys: पुरूष और महिलाओं के शरीर के बनावट में अंतर होता है, इसके साथ ही दोनों के आवाज में भी अंतर होता है। महिलाओं की आवाज पतली और पुरुषों की आवाज भारी होती है, लेकिन कुछ पुरुषों में यह बदलाव नहीं होता है, उनकी आवाज महिलाओं जैसी पतली होती है, जिस कारण वो कहीं पब्लिक प्लेस पर बोलने में हिचकते हैं और दोस्तों के बीच उनका मजाक भी बनता है, लेकिन कई लोग यह समझते हैं कि अब कुछ नहीं बदल सकता और इसे अपनी किस्मत मान कर हार मान लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह आपके सेहत से जुड़ा है। चलिए जानते हैं कि इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?

रिसर्च के मुताबिक

द जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म (JCEM) और ह्यूमन रिप्रोडक्शन की रिसर्च के मुताबिक पुरुषों की भारी आवाज का पूरी तरह टेस्टोस्टेरोन हार्मोन पर निर्भर होता है। 18 की उम्र के बाद यह हार्मोन गले के वॉयस बॉक्स को बढ़ाकर वोकल कॉर्डस को मोटा करने में सहायक होते हैं, लेकिन जब शरीर में चर्बी जमा हो जाती है तो यह एक एक्टिव अंग की तरह काम करने लग जाता है, इसमें मौजूद एरोमाटेज एजाइम पुरूष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को फीमेल हार्मोन के एस्ट्रोजन में बदलने लगता है, एस्ट्रोजन बढ़ने के कारण वॉयस बॉक्स का विकास रुक जाता है, जिस कारण आवाज भारी होने के बजाय पतली हो जाती है। इसके साथ ही फैट दिमाग के हाइपोथैलेमस को मिलने वाले संकेत को धीरे-धीरे कमजोर करने लगता है, जिससे टेस्टोस्टेरोन का विकास कम होने लगता है।

क्या है इलाज

इस समस्या का इलाज महंगी दवाओं में नहीं बल्कि लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करके ठीक किया जा सकता है। इसमें सबसे पहले अपने वजन को कम करने पर ध्यान देना चाहिए, जिससे एरोमाटेज एंजाइम के प्रभाव में कमी आती है और इससे टेस्टोस्टेरोन का स्तर प्राकृतिक रुप से सुधरने में मदद मिलती है।

रेसिस्टेंस ट्रेनिंग

एक्सपर्ट के अनुसार अगर आप रेसिस्टेंस ट्रेनिंग जैसे वजन उठाना और हाई-प्रोटीन डाइट शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता को बेहतर बनाने में मदद करते हैं, जिससे हार्मोनल संतुलन को सुधारने में काफी सहायक साबित होते हैं। अगर इन नेचुरल तरीकों से कोई लाभ न दिखे तो आपको डॉक्टर के परामर्श के बाद एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हार्मोन की थेरेपी करा सकते हैं, लेकिन इसमें हमेशा के लिए सुधार करना हो तो आपको वजन का नियंत्रण करना सबसे ज्यादा जरूरी है।

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