नई दिल्ली: विशेष विश्लेषण भारत सरकार ने पड़ोसी देशों, विशेषकर चीन से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में एक ऐसा बदलाव किया है जिसे आर्थिक गलियारों में 'साहसिक' और रणनीतिक हलकों में 'जोखिम भरा' करार दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला किया है कि अब उन कंपनियों को भारत में निवेश के लिए सरकारी मंजूरी की लंबी कतारों में नहीं लगना होगा, जिनमें पड़ोसी देशों के निवेशकों की 'बेनिफिशियल ओनरशिप' 10 प्रतिशत तक है।
यह कदम 2020 के उस ऐतिहासिक 'प्रेस नोट-3' के बाद का सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव है, जिसे गलवान घाटी की हिंसक झड़प और चीन के 'अवसरवादी अधिग्रहण' को रोकने के लिए लागू किया गया था। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत ने चीन के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है या यह 'ग्लोबल सप्लाई चेन' में अपनी जगह पक्की करने की एक मजबूरी है?
अप्रैल 2020 में जब दुनिया कोविड-19 की चपेट में थी, तब भारत ने सीमा साझा करने वाले सात देशों (चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान) से आने वाले हर एक पैसे के निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी थी। उद्देश्य स्पष्ट था, भारतीय कंपनियों को चीनी चंगुल से बचाना।
अब की स्थिति:
नए नियमों के अनुसार, यदि किसी विदेशी निवेश प्रस्ताव में पड़ोसी देश के निवेशक का हिस्सा 10% से कम है और वह कंपनी के प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं रखता, तो वह 'ऑटोमैटिक रूट' से भारत आ सकता है। यानी, अब फाइलों को दफ्तर-दफ्तर घूमने की जरूरत नहीं होगी। इसके अलावा, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर पैनल के लिए जरूरी 'पॉलीसिलिकॉन' जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश की मंजूरी की समय सीमा घटाकर 60 दिन कर दी गई है। हालांकि, सरकार ने सुरक्षा कवच के तौर पर यह शर्त रखी है कि इन जॉइंट वेंचर्स में भारतीय पक्ष के पास ही बहुमत (Majority) और नियंत्रण रहेगा।
सरकार के इस यू-टर्न के पीछे 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का तर्क दिया जा रहा है। बीते चार वर्षों में कई वैश्विक निवेश फंड्स ने भारत से दूरी बना ली थी क्योंकि उनके पोर्टफोलियो में चीनी निवेशकों की छोटी-छोटी हिस्सेदारी (Passive Shareholding) होती थी। इस वजह से तकनीकी रूप से वह पूरा निवेश 'प्रेस नोट-3' के दायरे में आ जाता था और महीनों तक मंजूरी अटकी रहती थी। भारत वर्तमान में 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का हब बनना चाहता है। कड़वी सच्चाई यह है कि इन क्षेत्रों की सप्लाई चेन पर चीन का एकाधिकार है। बिना चीनी कलपुर्जों, इंजीनियरों और उनकी छोटी हिस्सेदारी वाले ग्लोबल फंड्स के, भारत की मैन्युफैक्चरिंग रफ्तार नहीं पकड़ पा रही थी। सरकार को लगा कि नियमों की यह बेड़ियाँ अब भारत के ही पैरों में जंजीर बन रही हैं।
जहाँ उद्योग जगत इस फैसले पर राहत की सांस ले रहा है, वहीं सामरिक मामलों के विशेषज्ञ इसे 'खतरनाक ढील' मान रहे हैं। मशहूर रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका तर्क है कि 2020 के बाद भारत ने चीन से 'डी-कपल' (अलग होना) होने का संकल्प लिया था, लेकिन अब हम और भी अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। चेलानी ने आगाह किया कि पावर ग्रिड और ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश बीजिंग को भारत की अर्थव्यवस्था पर 'किल स्विच' (एक बटन से व्यवस्था ठप करने की क्षमता) जैसा नियंत्रण दे सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) लगभग 99.2 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, जो भारत के कुल रक्षा बजट से भी अधिक है। यानी, हम चीन से सामान खरीदकर अनजाने में उसकी सैन्य शक्ति को ही वित्तपोषित कर रहे हैं।
अगर आंकड़ों की गहराइयों में उतरें तो भारत और चीन के बीच एक अजीबोगरीब विरोधाभास साफ नजर आता है। एक तरफ सरहदों पर सेनाएं आमने-सामने हैं, तो दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर 'ड्रैगन' का दबदबा घटने के बजाय और गहराता जा रहा है। साल 2024-25 के वित्तीय आंकड़ों पर गौर करें तो द्विपक्षीय व्यापार का आंकड़ा 127.7 अरब डॉलर के स्तर को छू चुका है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक डरावनी सच्चाई छिपी है। भारत के लिए यह व्यापार पूरी तरह से एकतरफा झुका हुआ है; जहां हम चीन से 113.45 अरब डॉलर का भारी-भरकम आयात कर रहे हैं, वहीं हमारा निर्यात महज 14.25 अरब डॉलर पर सिमट कर रह गया है।
99.2 अरब डॉलर का यह विशालकाय व्यापार घाटा न केवल हमारी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी चिंता का विषय है। दिलचस्प बात यह है कि चीन भारत के लिए सामान का सबसे बड़ा स्रोत तो बना हुआ है, लेकिन निवेश के मामले में वह अब भी काफी पीछे है। अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों को खंगालें तो भारत में होने वाले कुल विदेशी निवेश (FDI) में चीन की हिस्सेदारी महज 0.32 प्रतिशत ही रही है, जिसके चलते वह निवेशकों की सूची में 23वें पायदान पर खड़ा है।
जाहिर है, चीन की रणनीति अब तक भारत को केवल एक बड़े 'बाजार' के रूप में इस्तेमाल करने की रही है, न कि एक 'मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर' के तौर पर। सरकार के ताजा नीतिगत बदलावों के पीछे का असली मकसद शायद इसी असंतुलन को तोड़ना है। नई दिल्ली की मंशा स्पष्ट है। चीन से केवल तैयार माल मंगाने के बजाय उसे इस बात के लिए मजबूर या प्रेरित किया जाए कि वह भारत में अपनी पूंजी लगाए, यहाँ कारखाने स्थापित करे और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करे। यह कदम सीधे तौर पर 'इम्पोर्ट सब्स्टिट्यूशन' यानी आयात के विकल्प तैयार करने की एक सोची-समझी कोशिश दिखाई देती है।
भारत सरकार इस समय एक पतली रस्सी पर चल रही है। एक तरफ उसे अपनी आर्थिक विकास दर को 7-8% पर बनाए रखने के लिए विदेशी तकनीक और पूंजी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करना आत्मघाती हो सकता है। 10% की यह सीमा एक 'मिडिल ग्राउंड' तलाशने की कोशिश है। यदि भारत को वास्तव में आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे चीनी निवेश का उपयोग अपनी क्षमताएं विकसित करने के लिए करना होगा, न कि अपनी निर्भरता बढ़ाने के लिए। आने वाले 60 दिनों में डीपीआईआईटी (DPIIT) के पास आने वाले आवेदनों की प्रकृति यह तय करेगी कि यह फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित होगा या फिर एक रणनीतिक चूक।
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