नई दिल्ली: देश की सियासत में एक बार फिर भारी हलचल शुरू हो गई है। केंद्र सरकार भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे और चुनावी व्यवस्था को पूरी तरह बदलने वाले एक बेहद महत्वाकांक्षी कदम पर काम कर रही है। सूत्रों से मिली बेहद पुख्ता जानकारी के मुताबिक, सरकार संसद के आगामी मॉनसून सत्र (Monsoon Session) से पहले एक क्रांतिकारी विधेयक लाने की रूपरेखा तैयार कर चुकी है। इस नए कदम को Delimitation Bill 2.0 का नाम दिया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार सरकार केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण यानी परिसीमन (Delimitation) ही नहीं करने जा रही, बल्कि इसे अपने सबसे बड़े एजेंडे 'एक देश, एक चुनाव' यानी One Nation One Election के साथ जोड़कर एक संयुक्त कानूनी दस्तावेज के रूप में पेश करने की योजना बना रही है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार भली-भांति जानती है कि इस तरह के बड़े और ऐतिहासिक संवैधानिक बदलावों को अमलीजामा पहनाना बिना विपक्षी सहयोग के मुमकिन नहीं है। यही वजह है कि इस बार सरकार ने संसद में सीधे बिल पटकने के बजाय बैकचैनल डिप्लोमेसी यानी पर्दे के पीछे से राजनीतिक दलों को साधने की रणनीति अपनाई है। सरकार के रणनीतिकारों ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) और तमिलनाडु की सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) जैसी मजबूत क्षेत्रीय ताकतों से सीधा संपर्क साधा है।
राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरें बेहद दिलचस्प हैं। पता चला है कि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के कुछ शीर्ष नेताओं ने इस नए प्रस्ताव को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है। वे इस विषय पर किसी भी तरह के कड़े विरोध के बजाय खुले दिमाग से चर्चा करने को राजी हो गए हैं। वहीं दूसरी तरफ, दक्षिण भारत में परिसीमन का सबसे मुखर विरोध करने वाली एम.के. स्टालिन की पार्टी डीएमके के तेवर भी इस बार बदले-बदले नजर आ रहे हैं। डीएमके ने पूरी तरह से दरवाजे बंद करने के बजाय थोड़ा लचीला रुख अपनाया है और वह देखना चाहती है कि सरकार के संशोधित प्रस्ताव में दक्षिण के राज्यों के हितों की रक्षा के क्या उपाय किए गए हैं।
सरकार की इस नई और सतर्क रणनीति के पीछे संसद के भीतर का वह कड़वा अनुभव है, जिससे वह हाल ही में गुजरी है। दरअसल, इससे पहले सरकार ने महिला आरक्षण (Women Reservation) और परिसीमन से जुड़े एक साझा प्रस्ताव को संसद के पटल पर रखा था। उस वक्त लोकसभा के कुल 529 उपस्थित सदस्यों में से केवल 298 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया था, जबकि 230 सदस्यों ने इसके खिलाफ वोट डाला था।
संवैधानिक संशोधन के नियमों के मुताबिक, इस तरह के विशेष विधेयकों को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत (Two-Thirds Majority) होना अनिवार्य है, जो उस वक्त के आंकड़ों के हिसाब से लगभग 352 वोट बैठता था। जरूरी संख्या बल न होने के कारण वह प्रस्ताव गिर गया था। अपनी इसी पुरानी गलती और कमी को सुधारने के लिए सरकार इस बार मॉनसून सत्र से पहले ही जरूरी आंकड़ों का जोड़-घटाव दुरुस्त कर लेना चाहती है।
इस पूरी सियासी पटकथा की पृष्ठभूमि को समझना भी बेहद जरूरी है। अप्रैल के महीने में सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का एक विशेष तीन दिवसीय सत्र आयोजित किया था। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) यानी महिला आरक्षण बिल को सर्वसम्मति से पास कराना था, जिसके तहत लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने का प्रावधान था। लेकिन विपक्षी एकजुटता और आम सहमति न बन पाने के चलते यह बिल दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सका।
इस बड़ी नाकामी के तुरंत बाद सरकार ने अपनी रणनीतिक चाल बदली। केंद्रीय विधायी और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने तुरंत मोर्चा संभाला और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से औपचारिक मुलाकात कर एक बड़ा अनुरोध किया। रिजिजू ने साफ कहा कि देश के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अन्य बेहद संवेदनशील और दूरगामी असर डालने वाले विधेयकों, जैसे 'यूनियन टेरिटरीज लॉ (अमेंडमेंट) बिल' और खुद 'डिलिमिटेशन बिल' को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए और आगे न बढ़ाया जाए। सरकार का मकसद साफ था—बिना जमीन तैयार किए कोई भी बड़ा रिस्क न लिया जाए।
अब जबकि सरकार दोबारा पूरे दमखम के साथ Delimitation Bill 2.0 को धरातल पर उतारने की तैयारी कर रही है, तो देश के राजनीतिक पंडितों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या One Nation One Election का सपना इस बार हकीकत बन पाएगा। अगर टीएमसी और डीएमके जैसी क्षेत्रीय पार्टियां सरकार के इस नए और संशोधित फॉर्मूले पर सहमत हो जाती हैं, तो यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होगा।
एक तरफ जहां देश में बार-बार होने वाले चुनावों के खर्च और आचार संहिता की बंदिशों से मुक्ति की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दल अपनी स्वायत्तता को लेकर चिंतित हैं। बहरहाल, मॉनसून सत्र के आने तक दिल्ली के सियासी गलियारों में बैठकों और मुलाकातों का दौर बेहद गर्म रहने वाला है, क्योंकि दांव पर देश की पूरी चुनावी व्यवस्था लगी हुई है।
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