भोपाल: आने वाली कुछ तारीखें मध्य प्रदेश की राजनीति और यहाँ के किसानों की किस्मत के लिए बेहद अहम होने जा रही हैं। भोपाल का जवाहर चौक मैदान उस गवाह बनने की तैयारी में है, जहाँ से कांग्रेस एक बड़ा बिगुल फूंकने वाली है। प्रस्तावित 'किसान महाचौपाल' को लेकर राजधानी में हलचल तेज है। हर तरफ कांग्रेस के झंडे और "किसान बचाओ, देश बचाओ" के नारे सुनाई दे रहे हैं। यह सिर्फ एक रैली नहीं, बल्कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा भाजपा की उस नीति के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान है, जो कथित तौर पर भारतीय खेती की चाबी विदेशी हाथों में सौंपने जा रही है।कांग्रेस ने इस बार सीधे उस नस पर हाथ रखा है जहाँ किसान सबसे ज्यादा डरा हुआ है- भारत और अमेरिका के बीच होने वाला संभावित व्यापारिक समझौता (Trade Deal)।
कांग्रेस के गलियारों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि केंद्र सरकार गुपचुप तरीके से ऐसी शर्तें मान रही है, जिनसे अमेरिकी सोयाबीन, कपास और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजारों में भर जाएंगे। राहुल गांधी का स्टैंड इस मामले में साफ है: वे इसे सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भारतीय किसान की आर्थिक 'लिंचिंग' मान रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार का "डिजिटल इंडिया" और "मेक इन इंडिया" का नारा किसानों के लिए खोखला साबित हो रहा है। राहुल गांधी इस रैली में यह मुद्दा उठाने वाले हैं कि जब मध्य प्रदेश का किसान पहले से ही सोयाबीन के सही दाम (MSP) के लिए सड़कों पर है, तब सरकार अमेरिका से सस्ता सोयाबीन मंगाकर यहाँ के किसानों की कमर क्यों तोड़ना चाहती है? पार्टी का आरोप है कि भाजपा अपने कुछ खास औद्योगिक मित्रों और विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए देश के करोड़ों अन्नदाताओं के भविष्य को अंधेरे में धकेल रही है।
रैली से पहले ही मैदान को लेकर जो खींचतान हुई, उसे कांग्रेस ने अपनी पहली नैतिक जीत मान लिया है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने संकेत दिया है कि लाल परेड ग्राउंड से हटाकर जवाहर चौक पर रैली भेजने की कोशिश असल में भाजपा सरकार की घबराहट है। कांग्रेस अध्यक्ष का मानना है कि सरकार किसानों की भीड़ को शहर के मुख्य हिस्सों से दूर रखना चाहती थी, लेकिन वे भूल गए कि किसानों का गुस्सा किसी मैदान का मोहताज नहीं होता। खड़गे के निशाने पर खासतौर से डेयरी सेक्टर है। उनका तर्क है कि अगर अमेरिका का दूध और पनीर भारत में डंप किया गया, तो गांव-गांव में चल रहे छोटे दुग्ध उत्पादक खत्म हो जाएंगे। यह सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा होगा।
इस पूरे आंदोलन के जरिए कांग्रेस ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल छेड़ दिए हैं, जिन्होंने मध्य प्रदेश के हर ग्रामीण परिवार को गहरे असमंजस और चिंता में डाल दिया है। कांग्रेस का सबसे बड़ा हमला मध्य प्रदेश की पहचान, यानी 'सोयाबीन' पर है। पार्टी का सीधा तर्क है कि जिस प्रदेश को पूरी दुनिया 'सोया स्टेट' के नाम से जानती है, वहाँ की रीढ़ तोड़ने की तैयारी दिल्ली में हो रही है। अगर अमेरिकी सोयाबीन को मामूली रियायत भी मिली, तो यहाँ की स्थानीय मंडियां किसी कबाड़खाने में तब्दील हो जाएंगी और किसान अपनी ही फसल को मिट्टी के मोल बेचने पर मजबूर हो जाएगा।
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ देश का अन्नदाता सड़कों पर उतरकर एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने अपना पूरा ध्यान विदेशों से माल मंगाने के रास्ते आसान करने पर लगा रखा है। कांग्रेस इस विडंबना को भाजपा की 'दोहरी नीति' बता रही है। उनका दावा है कि जब अपना घर अनाज से भरा हो, तब विदेशी बाजार को न्योता देना अपनों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है।
लड़ाई सिर्फ आज के दाम की नहीं है, बल्कि यह आने वाली नस्लों के भविष्य का सवाल बन गई है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का कहना है कि अगर एक बार हमारी खेती कॉर्पोरेट घरानों और बड़ी विदेशी कंपनियों के चंगुल में फंस गई, तो अगली पीढ़ी के पास अपनी ही पुरखौती जमीन पर कोई हक नहीं बचेगा। वे अपने ही खेतों में बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएंगे। यही वजह है कि भाजपा की वे तमाम दलीलें अब किसानों के बीच फीकी पड़ रही हैं जिनमें वे 'नई तकनीक' और 'आधुनिक बाजार' का सपना दिखा रहे हैं। किसान अब शब्दों के जाल को समझने लगा है और कांग्रेस इसी भरोसे को भाजपा के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जैसे जमीनी नेता दिन-रात एक किए हुए हैं ताकि इस रैली के जरिए दिल्ली तक संदेश जाए। कांग्रेस की रणनीति साफ है, इस रैली के बाद वे इस मुद्दे को सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर एक-एक किसान को यह समझाएंगे कि कैसे उनके थाली की रोटी पर विदेशी नजर गड़ी है। भोपाल का यह जमावड़ा 2026 की राजनीति की दिशा तय करने वाला है। यह लड़ाई अब सिर्फ वोटों की नहीं, बल्कि वजूद की बन गई है। कांग्रेस ने खुद को किसानों के सबसे बड़े ढाल के रूप में पेश किया है, और भाजपा फिलहाल इस 'किसान कार्ड' के सामने बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है। अगर यह जनसैलाब उम्मीद के मुताबिक उमड़ा, तो आने वाले समय में भाजपा के लिए ग्रामीण इलाकों में अपनी साख बचाना एक बड़ी चुनौती होगी।
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