Malihabad Fort Dispute: क्या है पूरा मामला, जिस पर लगातार बढ़ती जा रही सियासत
खबर सार :-
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रिज़वी बरेलवी ने लखनऊ स्थित मलिहाबाद किले के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए हैं। दरअसल, भोजशाला विवाद के समाधान के बाद से मलिहाबाद किले से जुड़ा मुद्दा ज़ोर पकड़ रहा है इस घटनाक्रम पर कई नेताओं की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
खबर विस्तार : -
लखनऊ के मलिहाबाद इलाके में स्थित कासमंडी किले को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस मामले में अब धार्मिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने पासी समाज की ओर से किए जा रहे दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि यह किला पासी समाज का नहीं बल्कि अवध के एक नवाब का था। उन्होंने कहा कि इस तरह के विवाद समाज में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश हैं।
क्या कहा मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने?
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी ने कहा कि जिस किले को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसका इतिहास स्पष्ट रूप से नवाबी दौर से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि किले के पास स्थित कब्रिस्तान मलिहाबाद के एक मुस्लिम परिवार का है और वहां मौजूद मस्जिद भी नवाब द्वारा बनवाई गई थी। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि समाज को ऐसे चेहरों और ताकतों को पहचानना चाहिए जो धार्मिक विवाद पैदा कर भाईचारे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
नीतीश राणे के बयान पर भी दी प्रतिक्रिया
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नीतीश राणे के मदरसों और इस्लाम को लेकर दिए गए बयान पर भी मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि नीतीश राणे इस्लाम और मदरसों के इतिहास से अनजान हैं।
मदरसों पर टिप्पणी को लेकर उन्होंने कहा कि राणे को पहले इस्लाम और मदरसों के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। उनके मुताबिक, मदरसे केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने वाले संस्थान भी हैं।
क्या है पासी समाज का दावा?
विवाद की जड़ मलिहाबाद के कासमंडी इलाके में स्थित एक पुराने किले से जुड़ी है। पासी समाज का दावा है कि यह किला दरअसल महाराजा कंस पासी के शासनकाल का हिस्सा था। समाज के लोगों का कहना है कि अंग्रेजी गजेटियर और स्थानीय ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस क्षेत्र का संबंध राजा कंस पासी से बताया गया है।
पासी समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार, कासमंडी नाम भी राजा कंस पासी के नाम से जुड़ा हुआ माना जाता है। उनका दावा है कि 11वीं शताब्दी में काकोरी और आसपास के क्षेत्रों में महाराजा कंस पासी का शासन था।
इतिहास से जुड़े कुछ स्थानीय विवरणों के आधार पर यह भी कहा जा रहा है कि उस समय सालार मसूद गाजी ने अवध क्षेत्र में कई हमले किए थे, लेकिन राजा कंस पासी ने उसका मुकाबला किया था। पासी समाज इसे अपनी ऐतिहासिक विरासत और शौर्य से जोड़कर देख रहा है।
मंदिर और पूजा को लेकर भी दावा
पासी समाज का कहना है कि किले के अंदर पहले पूजा-अर्चना होती थी और वहां एक प्राचीन शिव मंदिर भी मौजूद था। समाज के लोगों का आरोप है कि समय के साथ वहां मस्जिद और कब्रिस्तान बना दिए गए।
उनका यह भी दावा है कि वर्तमान में वहां हर शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती है और नई कब्रें भी बनाई जा रही हैं। इसी को लेकर समाज के लोगों में नाराजगी बढ़ी है। पासी समाज इस स्थल को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बताते हुए इसे संरक्षित करने की मांग कर रहा है।
मुस्लिम पक्ष ने दावों को बताया निराधार
दूसरी ओर मुस्लिम समाज के लोगों ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि वहां वर्षों से नमाज अदा की जा रही है और अचानक इस तरह के दावे करना माहौल खराब करने की कोशिश है।
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि हाल के वर्षों में देश के कई धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद सामने आए हैं और अब उसी क्रम में इस जगह को भी विवादित बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि अगर किसी को इतिहास से जुड़ी कोई आपत्ति है तो उसे अदालत या प्रशासन के सामने रखना चाहिए, न कि धार्मिक तनाव पैदा करना चाहिए।
विवाद की असली जड़ क्या है?
यह विवाद केवल जमीन या एक पुराने ढांचे का नहीं बल्कि इतिहास, धार्मिक पहचान और सामाजिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। एक ओर पासी समाज इस स्थल को अपनी ऐतिहासिक विरासत के रूप में देख रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे लंबे समय से धार्मिक उपयोग में आने वाली जगह बता रहा है।
स्थानीय प्रशासन अभी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। फिलहाल किसी बड़े टकराव की सूचना नहीं है, लेकिन दोनों पक्षों के दावों ने इस मुद्दे को संवेदनशील बना दिया है। इतिहासकारों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि ऐसे मामलों का समाधान तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और संबंधित एजेंसियां इस विवाद की जांच किस दिशा में आगे बढ़ाती हैं और क्या ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकेगा।
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