ICRA Report: नई दिल्ली से जारी ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2027 में लगभग 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। रेटिंग एजेंसी ICRA के आकलन में यह स्पष्ट किया गया है कि देश की आर्थिक रफ्तार स्थिर बनी रहेगी, हालांकि कुछ वैश्विक और घरेलू चुनौतियाँ विकास को प्रभावित कर सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खुदरा मुद्रास्फीति वित्त वर्ष 2026 के 2.1 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 में 4.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह वृद्धि उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति और बाजार की मांग पर असर डाल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, विकास दर में मामूली गिरावट के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति नीतिगत ब्याज दरों को लंबे समय तक स्थिर रख सकती है। RBI तरलता की स्थिति को संतुलित बनाए रखते हुए अर्थव्यवस्था को सहारा देने की रणनीति जारी रखेगा। इससे बाजार में स्थिरता बनी रहने की उम्मीद है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया की स्थिति, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी अनिश्चितता बन सकती है। भारत की कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता के कारण ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऊर्जा लागत बढ़ने से कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे उनके मुनाफे और विस्तार योजनाओं पर दबाव आ सकता है।
ICRA ने अनुमान लगाया है कि यदि कच्चे तेल की औसत कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो चालू खाता घाटा (CAD) वित्त वर्ष 2026 के 1.0 प्रतिशत से बढ़कर 2027 में 1.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से चालू खाता घाटे में 30-40 आधार अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है। यह भारत के बाहरी संतुलन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जीएसटी दरों में युक्तिकरण और त्योहारी मांग जैसे कारकों के चलते उपभोग का स्तर स्थिर बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि कम मूल्य के लेन-देन में तेजी आई है, खासकर क्रेडिट कार्ड उपयोग के मामले में, जहां लेन-देन की संख्या मूल्य की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ी है। यह संकेत देता है कि आम उपभोक्ता खर्च करने के प्रति सक्रिय है, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि निकट भविष्य में निजी क्षेत्र की निवेश गतिविधियां वैश्विक परिस्थितियों और लागत संरचना से प्रभावित रह सकती हैं। उच्च इनपुट लागत और अनिश्चित वैश्विक माहौल निवेशकों के निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पूंजी निवेश की गति धीमी पड़ सकती है।
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