Putin India Visit: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 दिसंबर यानी आज शाम भारत की दो दिवसीय यात्रा पर पहुंच रहे हैं। यह यात्रा इसलिए विशेष मानी जा रही है क्योंकि यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन पहली बार भारत आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होने वाली उनकी मुलाकात पर न सिर्फ एशिया, बल्कि वाशिंगटन, ब्रुसेल्स और बीजिंग तक की नजरें टिकी हुई हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक भू-राजनीति तेज़ी से बदल रही है, अमेरिका अपने टैरिफ दबाव के जरिए भारत की ऊर्जा नीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है और यूरोप रूस के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है। ऐसे में पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर वार्ता होगी, क्या समझौते होंगे, उसको लेकर दुनिया भर के विश्लेषकों ने अपनी-अपनी राय जाहिर की है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पुतिन की भारत यात्रा के दौरान कुछ न कुछ बहुत बड़ा होना वाला है, जो निश्चित तौर पर पूरे वैश्विक संतुलन को प्रभावित करेगा।
अमेरिका और यूरोपीय संघ पिछले दो वर्षों से भारत पर रूस से ऊर्जा आयात कम करने का दबाव बना रहे हैं। हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने यह संकेत दिया कि वाशिंगटन भारत को आर्थिक दबाव में रखकर उसकी विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहता है। इसके बावजूद भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह अपनी राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा। भारत-रूस रक्षा साझेदारी दशकों पुरानी और बेहद मजबूत है। यही कारण है कि पश्चिमी देश भारतीय रुख को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं। यूरोपीय देशों को साफ दिख रहा है कि भारत रूस से दूरी बनाने के दबाव में नहीं है, और यह संदेश पुतिन की मौजूदगी और भी मजबूत करता है।

अमेरिका के सुरक्षा विशेषज्ञ पीएम मोदी और पुतिन की होने वाली इस मुलाकात को यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में गंभीरता से देख रहे हैं। सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी की लीसा कर्टिस ने कहा कि यह यात्रा वाशिंगटन के लिए “सुविधाजनक” नहीं है, क्योंकि पुतिन ऐसे समय भारत आ रहे हैं जब रूस यूरोप पर साइबर-अटैक और ड्रोन घुसपैठ की चेतावनियां दे रहा है। कर्टिस के अनुसार भारत यह संकेत दे रहा है कि वह अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि वॉशिंगटन को ओवर-रिएक्ट नहीं करना चाहिए, क्योंकि रूस और भारत के रिश्ते परंपरागत रूप से मजबूत रहे हैं। अमेरिका के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत रणनीतिक स्वतंत्रता को किसी भी कीमत पर छोड़ने के मूड में नहीं है। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विशेषज्ञ तन्वी मदान ने कहा कि व्हाइट हाउस दो बातों पर बारीकी से नजर रखेगा-पुतिन को दिया जाने वाला औपचारिक सम्मान तथा रक्षा और ऊर्जा सहयोग से जुड़ी अंतिम घोषणाएँ। मदान ने यह भी कहा कि भारत की रूसी तेल खरीद अमेरिका के लिए एक बड़ा पर्यवेक्षण बिंदु बनी रहेगी।

चीन, जो रूस का प्रमुख साझेदार है, भारत-रूस वार्ता को ध्यान से देख रहा है। बीजिंग के लिए यह समझना अहम है कि रूस की भारत यात्रा से एशिया में शक्ति संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यही वजह है कि चीनी मीडिया इस मुलाकात की लगातार रिपोर्टिंग कर रहा है। भारत-रूस-चीन त्रिकोण एशिया की भू-राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, और पुतिन का यह दौरा इस समीकरण को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
पुतिन की यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीति नहीं है, बल्कि यह भारत के बढ़ते वैश्विक कद, उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रति उसके योगदान को भी दर्शाती है। पश्चिमी देशों को यह संकेत साफ मिल रहा है कि नई दिल्ली अपने सामरिक फैसले स्वयं लेगी-चाहे वह ऊर्जा सुरक्षा हो, रक्षा सहयोग हो या भू-राजनीतिक संतुलन। इस मुलाकात में रक्षा खरीद, ऊर्जा सहयोग, व्यापारिक तंत्र और यूक्रेन युद्ध पर संवाद जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह वार्ता वैश्विक कूटनीति में एक नया मोड़ ला सकती है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और रूस-पश्चिम तनाव चरम पर है। भारत का संदेश स्पष्ट है-वह न तो किसी ब्लॉक का हिस्सा बनेगा और न ही किसी के दबाव में अपनी विदेश नीति बदलेगा। पुतिन की यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि भारत आज वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
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