नई दिल्ली/बीजिंग: भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 31 अगस्त को तियानजिन में होने जा रही मुलाकात केवल शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं है। यह एक बहुआयामी रणनीतिक क्षण है जो वैश्विक राजनीति, क्षेत्रीय संतुलन और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। इसलिए अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया भर के देशों की नजर उस बैठक पर टिकी हुई है।
यह मुलाकात उस संवेदनशील पृष्ठभूमि में हो रही है जहां भारत और चीन के बीच संबंध बीते कुछ वर्षों में खासे तनावपूर्ण रहे हैं। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़पों के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट गहरा गया था। हालांकि, 2024 में रूस के कजान में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक और सीमा गश्त समझौते के बाद द्विपक्षीय संबंधों में कुछ नरमी आई है। 31 अगस्त की बैठक पीएम मोदी की सात सालों में पहली चीन यात्रा होगी और गलवान प्रकरण के बाद चीन में उनकी पहली मौजूदगी होगी। यह इस ओर संकेत है कि दोनों देश अब स्थिरता और संवाद की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं।
वैश्विक राजनीति के परिप्रेक्ष्य में एससीओ संगठनों की बैठक का बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है। इसलिए पूरी दुनिया की नजर एससीओ बैठक में होने वाली चर्चा और उस बैठक में लिए जाने वाले निर्णयों पर टिकी होगी।
एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों—भारत और चीन—के बीच संबंध न केवल क्षेत्रीय स्थिरता, बल्कि वैश्विक संतुलन के लिए भी बेहद अहम हैं। चीन की आक्रामक विदेश नीति, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में, अमेरिका और जापान जैसी ताकतों के लिए चिंता का विषय रही है। ऐसे में भारत का संतुलित दृष्टिकोण वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
एससीओ केवल एक मंच नहीं, बल्कि रूस, चीन, भारत और ईरान जैसी बड़ी ताकतों को एकजुट करने वाला संगठन है। भारत की इसमें सक्रिय भागीदारी यह संकेत देती है कि वह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। शी और मोदी की मुलाकात इस दिशा में एक अहम कदम मानी जा सकती है।
1-व्यापार और निवेश की संभावना: कोविड और सीमा विवादों के कारण भारत-चीन व्यापार में गिरावट आई थी, लेकिन चीन अब भी भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। यदि यह बैठक द्विपक्षीय व्यापार को नई दिशा देने में सफल होती है, तो भारतीय निर्यातकों और निर्माताओं के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।
2-निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: यदि द्विपक्षीय संबंध सुधरते हैं, तो चीन की कंपनियां भारत में फिर से निवेश बढ़ा सकती हैं। इससे मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप क्षेत्र को प्रोत्साहन मिल सकता है, हालांकि सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए।
3-सीमा स्थिरता का आर्थिक लाभ: सीमा पर स्थिरता होने से रक्षा बजट में असंतुलन कम होगा, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा में किया जा सकेगा। साथ ही विदेशी निवेशक भी भारत को एक स्थिर और सुरक्षित निवेश गंतव्य मानेंगे।
पीएम मोदी का बयान कि “भारत और चीन के बीच स्थिर, अनुमानित और रचनात्मक संबंध वैश्विक शांति और समृद्धि में योगदान देंगे”, यह इंगित करता है कि भारत अब टकराव से संवाद की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, परंतु अपनी संप्रभुता और हितों से समझौता किए बिना। वहीं, चीन के राजदूत और विदेश मंत्री के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि चीन भी इस मुलाकात को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य के रिश्तों की बुनियाद मान रहा है। दोनों देशों द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली जैसे कदम सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भी इशारा करते हैं।
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