5.29 करोड़ के Bank Loan Fraud में CBI Court का बड़ा फैसला: पूर्व बैंक अधिकारी और कंपनी प्रमुख को 7-7 साल की सजा

खबर सार :-

यह फैसला स्पष्ट करता है कि बैंकिंग व्यवस्था में धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के जरिए ऋण हासिल करने वाले दोषियों के खिलाफ कानून सख्ती से कार्रवाई कर रहा है। वर्षों तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया यह निर्णय वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वास बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
5.29 करोड़ के Bank Loan Fraud में CBI Court का बड़ा फैसला: पूर्व बैंक अधिकारी और कंपनी प्रमुख को 7-7 साल की सजा

खबर विस्तार : -

CBI Court Bank loan fraud: चेन्नई की विशेष केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) अदालत ने करीब 17 साल पुराने बैंक लोन फ्रॉड मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (BOI) के पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक और एक निजी कंपनी के प्रमुख को सात-सात वर्ष की कठोर कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर अलग-अलग जुर्माना भी लगाया है। यह मामला फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 28 हाउसिंग लोन स्वीकृत करने से जुड़ा था, जिससे सरकारी क्षेत्र के सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को 5.29 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय नुकसान हुआ।

पूर्व बैंक अधिकारी और कंपनी प्रमुख दोषी करार

सीबीआई की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, चेन्नई स्थित सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की ट्रिपलिकेन शाखा के तत्कालीन वरिष्ठ प्रबंधक दीपक वी. मेनन को अदालत ने दोषी ठहराते हुए सात वर्ष की कठोर कैद और 65 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं, ‘श्री शास्त्रु एसोसिएट्स कदान्थेत्ती प्राइवेट लिमिटेड’ के मुख्य प्रबंध निदेशक बी. शिवगणेशन को भी सात वर्ष की कठोर कैद के साथ 1.17 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

CBI Court-Chennai Central Bank of India-5.29 Cr Loan fraud

कंपनी पर भी लगा आर्थिक दंड

अदालत ने मामले में शामिल निजी कंपनी को भी दोषी मानते हुए उस पर 26 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। सीबीआई का कहना है कि कंपनी और उसके प्रमुख ने बैंक अधिकारी के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और नियमों की अनदेखी करते हुए हाउसिंग लोन स्वीकृत कराए, जिससे बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

2006-07 में हुए थे फर्जी हाउसिंग लोन

यह मामला वर्ष 2006 और 2007 के दौरान स्वीकृत किए गए 28 हाउसिंग लोन से जुड़ा है। आरोप था कि इन लोन को जाली और मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर मंजूरी दी गई। लोन वितरण की पूरी प्रक्रिया में बैंकिंग नियमों का उल्लंघन किया गया और वास्तविक पात्रता की जांच किए बिना धनराशि जारी कर दी गई।

2009 में जांच-पड़ताल के बाद दर्ज हुआ था मामला

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत के आधार पर सीबीआई ने 29 अप्रैल 2009 को मामला दर्ज किया था। जांच के दौरान एजेंसी ने वित्तीय दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की गहन पड़ताल की। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि फर्जी ऋण वितरण के कारण फरवरी 2010 तक बैंक का बकाया 5.29 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका था।

CBI Court-Bank loan Fraud-5.29 Cr

चार आरोपियों के खिलाफ दायर हुई थी चार्जशीट

सीबीआई ने जांच पूरी होने के बाद 30 जून 2010 को चार आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। इनमें पूर्व बैंक अधिकारी दीपक वी. मेनन, कंपनी प्रमुख बी. शिवगणेशन, संबंधित निजी कंपनी और एक निजी व्यक्ति एस. वैद्यनाथन शामिल थे। हालांकि मुकदमे के दौरान एस. वैद्यनाथन का निधन हो गया, जिसके बाद उनके खिलाफ न्यायिक कार्रवाई समाप्त कर दी गई।

लंबी सुनवाई के बाद आया फैसला

विशेष सीबीआई अदालत ने वर्षों तक चले मुकदमे के दौरान पेश किए गए दस्तावेजी साक्ष्यों, गवाहों के बयान और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि शेष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप पर्याप्त रूप से सिद्ध हुए हैं। इसके बाद अदालत ने दोनों दोषियों को सात-सात वर्ष की कठोर कैद और आर्थिक दंड की सजा सुनाई। यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र में वित्तीय अनियमितताओं और ऋण धोखाधड़ी के मामलों में सख्त कार्रवाई का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

ये भी पढ़ें......ED Action: 356 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में ईडी का बड़ा एक्शन, 35.52 करोड़ की संपत्ति जब्त

 

अन्य प्रमुख खबरें