Sheetala Ashtami: शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़ी भीड़, श्रद्धालुओं ने की विशेष पूजा
खबर सार :-
Sheetala Ashtami 2026: संगम नगरी प्रयागराज के कल्याणी देवी मंदिर के एक पुजारी ने बताया कि हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी और अष्टमी के दिनों का खास महत्व है। इस दिन देवी कल्याणी को सोने-चांदी के गहनों के साथ-साथ चमेली के फूलों, गुलाब और फलों से सजाया जाता है।
खबर विस्तार : -
Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी के शुभ अवसर पर प्रयागराज स्थित शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। बड़ी संख्या में भक्त देवी भगवती का आशीर्वाद लेने और अपने परिवार की खुशी, समृद्धि और भलाई के लिए प्रार्थना करने मंदिर पहुंचे। सुबह से ही मंदिर में भक्तों की लंबी कतारें देखी गईं। भक्तों ने मां कल्याणी देवी के दर्शन किए, विशेष अनुष्ठानों में भाग लिया और अपने परिवार की शांति और खुशी के लिए आशीर्वाद मांगा। प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए ताकि भक्तों को कोई असुविधा न हो।
शीतला अष्टमी पर विशेष पूजा
शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक ने बताया कि मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी की परंपरा का बहुत महत्व है। उन्होंने बताया कि यहाँ साल में चार बार शीतला अष्टमी मनाई जाती है, जो चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ महीनों में कृष्ण पक्ष की अष्टमी (चंद्रमा के घटने का चरण) को पड़ती है। ये धार्मिक आयोजन चैत्र महीने में शुरू होते हैं और आषाढ़ अष्टमी के साथ संपन्न होते हैं।
पति और पुत्रों की लंबी उम्र के लिए महिलाएं रखती हैं व्रत
उन्होंने बताया कि शीतला अष्टमी के अवसर पर, माताएं अपने बेटों और पतियों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि के लिए सप्तमी (सातवीं तिथि) को व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान, सप्तमी की रात को हलवा-पूरी बनाई जाती है। अष्टमी के दिन, यही भोजन देवी शीतला को भोग (पवित्र प्रसाद) के रूप में चढ़ाया जाता है और परिवार के सभी सदस्य इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
150 साल पुरानी है परंपरा
पंडित श्याम जी पाठक ने बताया कि इस परंपरा के अनुसार, कई घरों में अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता है। सप्तमी को बनाया गया भोजन ही पूरे दिन प्रसाद के रूप में खाया जाता है। इसी वजह से इस त्योहार को 'बसौड़ा' या 'बासीवाड़ा अष्टमी' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने बताया कि प्रयाग के पवित्र तीर्थ स्थल पर स्थित मां कल्याणी देवी धाम में यह परंपरा लगभग 150 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है। पूर्वजों के समय से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा का पालन आज भी उसी श्रद्धा और तय रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है।
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