शाही लीची से कोसा सिल्क तक... भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दे रहे पूर्वी- मध्य भारत के ‘जीआई’ उत्पाद

खबर सार :-
भारत का हर राज्य अपनी पारंपरिक कलाओं व स्थानीय उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है। जीआई टैग से इन स्थानों को अपने विशिष्ट उत्पादों की वजह से दुनियाभर में अलग पहचान मिल रही है।
शाही लीची से कोसा सिल्क तक... भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दे रहे पूर्वी- मध्य भारत के ‘जीआई’ उत्पाद
खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: भारत की असली पहचान उसकी विविधता, परंपराओं और स्वदेशी उत्पादों में निहित है। देश के विभिन्न राज्यों में सदियों से तैयार किए जा रहे पारंपरिक उत्पाद आज वैश्विक मंच पर अपनी एक अलग छाप छोड़ रहे हैं। इन उत्पादों को दिया गया GI (भौगोलिक संकेत) टैग न केवल उनकी अनूठी पहचान की रक्षा करता है, बल्कि स्थानीय किसानों, बुनकरों और कारीगरों की कड़ी मेहनत को वैश्विक मंच पर लाने का भी काम करता है।

हाल ही में, अपने विदेश दौरों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी नेताओं को उपहार के रूप में कई पारंपरिक भारतीय उत्पाद भेंट किए। इनमें जयपुर की 'ब्लू पॉटरी', 'मीनाकारी-कुंदन' कला, 'मिथिला मखाना' और ओडिशा की 'रूपा तारकसी' (चांदी की महीन कारीगरी) जैसी वस्तुएं शामिल थीं। इस पहल ने एक बार फिर भारतीय GI-टैग वाले उत्पादों की वैश्विक पहचान को और मजबूत किया। भारत में 600 से अधिक उत्पादों को पहले ही GI टैग मिल चुका है। इस संबंध में पूर्वी और मध्य भारत के राज्यों का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्रों के पारंपरिक उत्पाद आज राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक बन गए हैं।

मिठास के लिए प्रसिद्ध मुजफ्फरपुर की 'शाही लीची' 

बिहार के कई उत्पाद अपनी गुणवत्ता और पारंपरिक स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं। मुजफ्फरपुर की 'शाही लीची' अपनी मिठास और खुशबू के कारण देश और विदेशों में बेहद पसंद की जाती है। 'मिथिला मखाना' ने अब वैश्विक बाजार में एक मान्यता प्राप्त 'सुपरफूड' के रूप में अपनी जगह बना ली है। नालंदा का 'सिलाओ खाजा' अपनी कुरकुरी परतों के लिए मशहूर है, जबकि 'मगही पान' और भागलपुर का 'कतर्नी' चावल अपनी अनोखी खुशबू के कारण लोगों के पसंदीदा बने हुए हैं। इनके अलावा 'भागलपुरी' रेशम, 'सिक्की' घास से बनी हस्तकला, ​​'सुजनी' कला और 'मंजूषा' कला जैसी पारंपरिक कला शैलियां दुनिया के सामने राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करती हैं।

पारंपरिक हस्तकलाओं से झारखंड की पहचान

झारखंड की पहचान भी उसकी पारंपरिक हस्तकलाओं और प्राकृतिक उत्पादों से गहराई से जुड़ी हुई है। सरायकेला-खरसावां क्षेत्र का 'तसर' रेशम और 'कुचाई' हल्दी विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। वहीं, रांची और उसके आसपास के क्षेत्रों में बनने वाले आदिवासी आभूषण और बांस से बनी हस्तकलाएं स्थानीय कारीगरी के शानदार उदाहरण माने जाते हैं। देवघर का अट्ठे मटन और सिमडेगा की मीठी इमली भी इस क्षेत्र की खास पहचान को और मजबूत करते हैं।

ओडिशा की कला को GI टैग ने दी नई ऊंचाई

GI टैग ने ओडिशा की कला और परंपराओं को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। पुरी की पट्टाचित्र कला अपनी पारंपरिक पेंटिंग्स के लिए दुनियाभर में मशहूर है। कटक की रूपा तारकसी चांदी की बारीक कारीगरी राज्य की ऐतिहासिक कला विरासत का प्रतीक है। संबलपुरी बंधा और बोमकाई साड़ियां अपनी बेहतरीन बुनाई और पारंपरिक डिजाइनों के लिए जानी जाती हैं। ओडिशा के कृषि और खाद्य उत्पाद भी बहुत लोकप्रिय हैं। कंधमाल की हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए मशहूर है। कोरापुट के काले जीरे वाले चावल को उसकी खास खुशबू और स्वाद की वजह से जाना जाता है। 

बंगाल की मिठाइयां विश्वप्रसिद्ध

पश्चिम बंगाल अपनी कला, साहित्य और हस्तशिल्प की समृद्ध परंपराओं के लिए लंबे समय से मशहूर रहा है। दार्जिलिंग चाय को दुनियाभर में भारतीय चाय के सबसे बेहतरीन प्रतीक के तौर पर पहचाना जाता है। शांतिपुरी साड़ी, नक्षी कांथा और बंगाल पट्टचित्र जैसी कला शैलियां राज्य की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत और समृद्ध बनाए रखती हैं।बंगाल के खाद्य उत्पादों में जयनगर मोआ, नोलेन गुड़-एर संदेश, मिहिदाना और सीताभोग जैसी मिठाइयां लोगों के बीच बहुत पसंद की जाती हैं। मालदा की आम की किस्में खास तौर पर फजली, हिमसागर और लक्ष्मणभोग अपनी बेमिसाल मिठास की वजह से एक खास पहचान रखती हैं। इसके अलावा गोविंदभोग और तुलाईपंजी चावल की किस्में अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए मशहूर हैं।

मध्य प्रदेश की महेश्वरी और चंदेरी साड़ियां मशहूर

मध्य प्रदेश के GI-टैग वाले उत्पाद दुनिया के सामने राज्य की परंपराओं और कारीगरी को पेश करते हैं। महेश्वरी और चंदेरी साड़ियां देश के सबसे मशहूर हथकरघा वस्त्रों में गिनी जाती हैं। बाघ प्रिंट अपनी प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक ब्लॉक-प्रिंटिंग तकनीकों के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है। ग्वालियर के कालीन और जबलपुर की पत्थर की कारीगरी ने भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफलतापूर्वक अपनी जगह बनाई है। खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में मुरैना की गजक, रतलामी सेव और शरबती ​​गेहूं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। रीवा के सुंदरजा आम और बालाघाट के चिन्नौर चावल ने भी अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के कारण एक अलग पहचान बनाई है। डिंडोरी की गोंड पेंटिंग और लोहे की कारीगरी को आदिवासी कला का अनमोल खजाना माना जाता है।

छत्तीसगढ़ की लोहे की कारीगरी कला का उत्कृष्ट उदाहरण

छत्तीसगढ़ भी GI-टैग वाले उत्पादों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर रहा है। बस्तर ढोकरा कला राज्य का पहला ऐसा उत्पाद था जिसे GI-टैग मिला। यह धातु की कारीगरी का एक प्राचीन रूप है जिसकी सराहना देश और विदेश दोनों जगह होती है। बस्तर की लोहे की कारीगरी और लकड़ी की कारीगरी भी आदिवासी कला के शानदार उदाहरण हैं। राज्य का जीराफूल चावल अपनी खुशबू और बारीक दानों के लिए मशहूर है। चंपा सिल्क साड़ियों की भी एक अलग पहचान है।

अन्य प्रमुख खबरें