नई दिल्ली : मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान युद्ध की आहट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को रॉकेट बना दिया है। इसका सीधा और घातक असर भारतीय शेयर बाजार, मुद्रा (रुपया) और आम आदमी की जेब पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
बीते 24 घंटों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अप्रत्याशित तेजी देखी गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें एक ही दिन में 25 प्रतिशत से अधिक उछलकर 115 से 118 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं। यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी दैनिक बढ़ोत्तरी है। बाजार विशेषज्ञों का डरावना अनुमान है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा भी छू सकते हैं।
तेल की कीमतों में इस आग की मुख्य वजह सप्लाई चेन का टूटना है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। फारस की खाड़ी का यह मार्ग युद्ध के कारण बंद या बाधित होने की कगार पर है। निवेशकों को डर है कि अगर यहाँ सैन्य टकराव बढ़ता है, तो दुनिया भर में ईंधन की भारी किल्लत हो जाएगी।
ईरान युद्ध का असर भारत में तीन प्रमुख मोर्चों पर दिख रहा है:
जैसे ही तेल की कीमतें बढ़ीं, भारतीय शेयर बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांक (Sensex और Nifty) ताश के पत्तों की तरह ढह गए। सबसे ज्यादा मार उन सेक्टरों पर पड़ी है जिनकी लागत ईंधन पर निर्भर है:
एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स: एटीएफ (हवाई ईंधन) महंगा होने के डर से निवेशकों ने बिकवाली की।
पेंट और केमिकल: कच्चे तेल के उप-उत्पादों का उपयोग करने वाली कंपनियों के शेयर धड़ाम हो गए।
कच्चे तेल का आयात करने के लिए भारत को अधिक डॉलर की आवश्यकता पड़ रही है। डॉलर की बढ़ती मांग ने भारतीय रुपये को कमजोर कर दिया है। रुपया फिसलकर 92 रुपये प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर के करीब पहुंच गया है।
भारत अपनी जरूरत का 80-85% कच्चा तेल आयात करता है। आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल में 1 डॉलर की वृद्धि होने पर भारत का वार्षिक आयात बिल करीब 1.5 से 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। इससे देश का चालू खाता घाटा (CAD) अनियंत्रित होने का खतरा पैदा हो गया है।
ईरान और इजराइल के बीच छिड़े इस युद्ध का असर केवल आर्थिक आंकड़ों या शेयर बाजार के ग्राफ तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा और कड़ा प्रहार आम आदमी की रसोई और उसकी जेब पर पड़ने वाला है। युद्ध की आहट के साथ ही भारत में महंगाई का दबाव साफ दिखने लगा है, जहाँ रसोई गैस यानी कुकिंग गैस की कीमतों में पहले ही 60 रुपये की भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। यह तो महज एक शुरुआत मानी जा रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग अंततः घरेलू ईंधन की कीमतों को और ऊपर ले जाएगी। जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सबसे पहला और बड़ा असर परिवहन क्षेत्र पर पड़ता है।
डीजल की कीमतों में उछाल आने से माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है, जिसका सीधा परिणाम बाजार में मिलने वाली सब्जियों, अनाज और अन्य आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के रूप में सामने आता है। इससे न केवल आम आदमी का मासिक बजट बिगड़ता है, बल्कि देश की खुदरा महंगाई दर में भी तेज उछाल आने की आशंका बढ़ जाती है। सिर्फ इतना ही नहीं, भारत की समग्र आर्थिक सेहत यानी जीडीपी ग्रोथ पर भी इस युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं। आर्थिक विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर तक पहुंचती हैं, तो भारत की विकास दर की रफ्तार काफी सुस्त पड़ सकती है। कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ने से उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा और आम लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाएगी, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में एक तरह का धीमापन आ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे। इसमें रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) का उपयोग करना और रूस जैसे देशों से रियायती दरों पर तेल की तलाश करना शामिल हो सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें मध्य-पूर्व के हालात पर टिकी हैं। यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।
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