Iran War and Oil Prices : मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते युद्ध के बादलों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है। ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बढ़ते सैन्य टकराव की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में 25 प्रतिशत तक की रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी कर दी है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञ इसे हाल के दशकों का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट मान रहे हैं।
मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क पर कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 115-118 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गईं। बाजार विश्लेषकों का दावा है कि यदि युद्ध की स्थिति लंबी खिंचती है, तो यह आंकड़ा जल्द ही 150 डॉलर प्रति बैरल की मनोवैज्ञानिक सीमा को पार कर सकता है। इस उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह 'सप्लाई चेन' का टूटना है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। यदि इस मार्ग पर सैन्य अवरोध पैदा होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति ठप पड़ सकती है, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा का अकाल पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों का सीधा प्रहार भारतीय मुद्रा पर पड़ा है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ऐतिहासिक गिरावट के साथ 93 रुपये प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। तेल महंगा होने से भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ गया है और रुपये की साख गिर रही है।
ईरान-इजरायल युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में जो उबाल आया है, उसका सबसे गहरा और सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। भारत अपनी तेल संबंधी जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात के जरिए पूरा करता है, जो इसे वैश्विक कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है। आर्थिक विशेषज्ञों का गणित डराने वाला है; उनके अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली मात्र 1 डॉलर की वृद्धि भारत के वार्षिक आयात बिल में 1.5 से 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ा देती है।
मौजूदा स्थिति में जब कीमतें $115 के पार जा चुकी हैं, तो यह बढ़ता हुआ आयात बिल भारत के 'चालू खाता घाटे' (Current Account Deficit - CAD) को अनियंत्रित कर सकता है। जब आयात के लिए भुगतान करने हेतु डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपया कमजोर होता है और देश की वित्तीय स्थिरता को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। यदि यह तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो सरकारी खजाने पर बढ़ता दबाव देश के विकास कार्यों और बजटीय अनुमानों को भी प्रभावित कर सकता है।
मध्य-पूर्व के तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग की तपिश अब सीधे तौर पर दलाल स्ट्रीट तक पहुंच गई है। वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांकों में भारी बिकवाली देखी जा रही है, जिससे निवेशकों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल के दामों में उछाल उन क्षेत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा है जिनकी परिचालन लागत सीधे तौर पर ईंधन पर टिकी होती है। विशेष रूप से एयरलाइन और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भारी दबाव देखा जा रहा है, क्योंकि एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा होने की आशंका ने इन कंपनियों के मुनाफे पर सवालिया निशान लगा दिया है। इसी तरह, पेंट और केमिकल इंडस्ट्री के शेयरों में भी गिरावट का दौर जारी है, क्योंकि इन उद्योगों में कच्चे तेल के उप-उत्पादों (Derivatives) का बड़े पैमाने पर कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, लॉजिस्टिक कंपनियों पर भी दोहरी मार पड़ रही है; एक तरफ माल ढुलाई की लागत बढ़ने का डर है और दूसरी तरफ मांग में कमी आने की आशंका, जिससे पूरे सेक्टर का सेंटिमेंट बिगड़ गया है। यदि तेल की कीमतें $120 के स्तर को पार कर स्थिर रहती हैं, तो आने वाले दिनों में बाजार में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें कम नहीं हुईं, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संशोधन अनिवार्य हो जाएगा। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई महंगी होगी, जिसका सीधा असर सब्जियों, दालों और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा। इससे आने वाले समय में खुदरा महंगाई (CPI) में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
युद्ध के इस संकट के बीच भारत सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। सरकार संकट से निपटने के लिए अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Oil Reserves) का उपयोग कर सकती है। इसके अलावा, अन्य वैकल्पिक देशों से सस्ता कच्चा तेल खरीदने की संभावनाओं को भी तलाशा जा रहा है ताकि घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रहे।
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