US Attack On Iran : ईरान में जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं पर खुली बयानबाज़ी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तीखे संकेत और ईरान के भीतर बढ़ता जन-असंतोष-इन सभी ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बेचैनी बढ़ा दी है। सवाल केवल यह नहीं है कि अमेरिका हमला करेगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि यदि ऐसा हुआ तो दुनिया की बड़ी शक्तियाँ किस पाले में खड़ी नज़र आएंगी। ईरान और अमेरिका के रिश्तों में कड़वाहट नई नहीं है। वर्ष 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को गिराया था। प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग द्वारा तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद पश्चिमी शक्तियों ने शाह पहलवी को दोबारा सत्ता में बैठाया। यही हस्तक्षेप आगे चलकर 1979 की इस्लामिक क्रांति की नींव बना, जिसने अमेरिका समर्थक शासन को उखाड़ फेंका। चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह टकराव आज तक खत्म नहीं हो सका है।
यदि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो सबसे पहले नज़र रूस और चीन पर जाती है। दोनों देश ईरान के रणनीतिक साझेदार हैं और अमेरिकी दबाव की खुलकर आलोचना भी करते रहे हैं। रूस ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को अवैध बताते हुए कहा है कि पश्चिमी ताकतें आंतरिक असंतोष का इस्तेमाल कर ईरानी राज्य को अस्थिर करना चाहती हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और ईरान के बीच सैन्य व आर्थिक सहयोग ज़रूर गहरा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद मॉस्को सीधे अमेरिका से टकराने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं दिखता। चीन का रुख़ भी लगभग ऐसा ही है। वह ईरान के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है, मगर उसकी भाषा संतुलित और संयमित है। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका के साथ उसका गहरा व्यापारिक रिश्ता है। चीन स्पष्ट कर चुका है कि वह ईरान को कोई सैन्य सुरक्षा गारंटी नहीं देगा।
जी-7 देशों ने ईरान में हो रहे प्रदर्शनों और सरकारी दमन पर कड़ा बयान जारी किया है। इन देशों का कहना है कि ईरानी नागरिक बेहतर जीवन, गरिमा और स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार बल प्रयोग के ज़रिये विरोध को कुचल रही है। हालांकि यह रुख़ ईरान के मौजूदा शासन के खिलाफ़ है, लेकिन जी-7 का ज़ोर फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से ज़्यादा प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव पर दिखाई देता है।
ईरान के मसले पर इस्लामी देशों की प्रतिक्रिया बेहद कमजोर और बिखरी हुई नज़र आती है। तुर्की ने ज़रूर विदेशी हस्तक्षेप का विरोध किया है, लेकिन उसका मुख्य निशाना इसराइल रहा है, न कि अमेरिका। अरब देशों की चिंता ईरान की सरकार से ज़्यादा क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर है। सऊदी अरब, क़तर और ओमान जैसे देश पर्दे के पीछे अमेरिका को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश पूरे मध्य पूर्व को आग में झोंक सकती है।
खाड़ी देशों की सबसे बड़ी आशंका होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जहाँ से दुनिया का लगभग पाँचवां हिस्सा तेल गुजरता है। किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में इस समुद्री मार्ग का बाधित होना वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दे सकता है। इसी वजह से सऊदी अरब ने संकेत दिए हैं कि वह किसी संभावित हमले में न तो शामिल होगा और न ही अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने देगा। अमेरिकी प्रशासन के भीतर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि सभी विकल्प खुले हैं और वे ईरानी प्रदर्शनकारियों को नैतिक समर्थन भी दे रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान को लगा कि उसके अस्तित्व पर सीधा खतरा है, तो वह जोखिम भरे कदम उठा सकता है, जिसका असर पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर पड़ेगा। स्पष्ट है कि ईरान का संकट केवल एक देश की आंतरिक समस्या नहीं रह गया है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है।
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