लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सरजमीं पर 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी से बजता दिखाई दे रहा है। सूबे की सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने के लिए 'दलित वोट बैंक' (UP Dalit Vote Bank) एक बार फिर सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जहाँ अपनी सरकारी योजनाओं के जरिए इस वर्ग के दिल में उतरने की कोशिश कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 14 अप्रैल को आने वाली अंबेडकर जयंती से ठीक पहले प्रदेश में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चरम पर है।
लोकसभा चुनाव के परिणामों से सबक लेते हुए भाजपा ने दलितों को साधने के लिए जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने एक व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया है। इसी क्रम में योगी सरकार ने 'डॉ. बी.आर. अंबेडकर मूर्ति विकास योजना' का मास्टरस्ट्रोक खेला है। इस योजना के तहत न केवल बाबा साहब, बल्कि संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों की मूर्तियों का सौंदर्यीकरण और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। भाजपा का लक्ष्य 45 जिलों के अनुसूचित वर्ग के बीच जाकर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार करना है। पार्टी प्रवक्ता अवनीश त्यागी का दावा है कि विपक्षी दलों ने केवल नारे दिए, जबकि भाजपा ने वास्तविक सम्मान और उत्थान का कार्य किया है।
कभी यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी अब अपनी छवि बदल रही है। अखिलेश यादव की अगुवाई में सपा ने बसपा से आए दिग्गज नेताओं को आगे कर दलित समाज में पैठ बनाने की रणनीति अपनाई है। पार्टी अब आधिकारिक तौर पर कांशीराम जयंती और अंबेडकर जयंती मना रही है। सपा प्रवक्ता अशोक यादव का कहना है कि भाजपा की राजनीति केवल प्रतीकात्मक है। उनके अनुसार, दलितों का भला केवल आरक्षण और सामाजिक न्याय (Social Justice) से होगा, जिसकी लड़ाई सपा मजबूती से लड़ रही है।
कांग्रेस भी इस रेस में पीछे नहीं है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार जैसे बड़े चेहरों के जरिए कांग्रेस दलितों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि भाजपा संविधान के लिए खतरा है। कांग्रेस प्रवक्ता अंशू अवस्थी का आरोप है कि भाजपा की योजनाएं केवल चुनावी स्टंट हैं। दूसरी ओर, मायावती के नेतृत्व वाली बसपा अपने पारंपरिक 'जाटव वोट बैंक' को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। बसपा लगातार सपा के पुराने रिकॉर्ड्स, जैसे गेस्ट हाउस कांड और पदोन्नति में आरक्षण के विरोध को याद दिलाकर दलितों को आगाह कर रही है। मायावती एक बार फिर दलित-ब्राह्मण गठजोड़ बनाने की फिराक में हैं, लेकिन कमजोर संगठन उनके लिए बड़ी बाधा बना हुआ है।
उत्तर प्रदेश की वर्तमान सियासी परिस्थितियों पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि आगामी 2027 की चुनावी जंग अब पूरी तरह से दलित वोट बैंक के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है। उनके अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानों से लेकर पूर्वांचल के घाटों तक, दलित मतदाता ही वह निर्णायक शक्ति होंगे जो यह तय करेंगे कि लखनऊ के सिंहासन पर किसका राजतिलक होगा। रावत विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि जहाँ एक ओर भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकारी मशीनरी और महापुरुषों के स्मारकों के सौंदर्यीकरण जैसी योजनाओं के जरिए इस वर्ग के साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस 'संविधान बचाओ' के नारे को ढाल बनाकर इस बड़े वोट बैंक को अपने पाले में खींचने की जुगत में हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता अब महज एक 'वोट बैंक' भर नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वास्तविक 'किंगमेकर' की भूमिका में उभरकर सामने आए हैं। अंबेडकर जयंती के अवसर पर प्रदेश भर में होने वाले शक्ति प्रदर्शन और विशेष कार्यक्रम इस बात का लिटमस टेस्ट होंगे कि किस राजनीतिक दल की आवाज दलित बस्तियों के भीतर तक अपनी पैठ बना पा रही है। स्पष्ट है कि 2027 की सत्ता का रास्ता इन्हीं बस्तियों के समर्थन और विश्वास से होकर गुजरेगा, जिसके लिए सभी दलों ने अपनी पूरी बिसात बिछा दी है।
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