कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए दिन होने वाले उलटफेर के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। गुरुवार को कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाकर ममता बनर्जी ने वरिष्ठ अधिवक्ता और हुगली के श्रीरामपुर से चार बार के सांसद कल्याण बनर्जी को लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त करने की घोषणा की।
यह घटनाक्रम इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि लगभग नौ महीने पहले कल्याण बनर्जी ने इसी पद से अचानक इस्तीफा देकर सबको हैरत में डाल दिया था। अब अपनी पुरानी कुर्सी पर उनकी बहाली ने पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन के नए समीकरणों को जन्म दे दिया है।
अगस्त 2025 में जब कल्याण बनर्जी ने मुख्य सचेतक के पद से अपना त्यागपत्र सौंपा था, तो ममता बनर्जी ने बिना किसी देरी के उसे स्वीकार कर लिया था। उस समय कल्याण बनर्जी और नादिया जिले के कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा के बीच सार्वजनिक रूप से हुआ वाकयुद्ध सुर्खियों में था। दोनों नेताओं के बीच जारी तनातनी ने पार्टी की छवि पर भी असर डाला था, जिसके बाद काकोली घोष दस्तीदार को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन अब काकोली की जगह फिर से कल्याण बनर्जी को कमान देना यह संकेत देता है कि अनुभव और आक्रामकता के मामले में ममता बनर्जी अभी भी अपने पुराने सहयोगियों को ही प्राथमिकता दे रही हैं।
कालीघाट की बैठक में मौजूद सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी ने कल्याण बनर्जी की कानूनी सूझबूझ की जमकर तारीफ की। विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) से जुड़े जटिल मामलों को जिस तरह से एक वकील (Advocate) के तौर पर कल्याण बनर्जी ने संभाला, उसने मुख्यमंत्री का दिल जीत लिया। ममता ने खुले मंच से स्वीकार किया कि सदन के भीतर और अदालती कार्यवाही में कल्याण बनर्जी की धार आज भी बेजोड़ है। शायद यही वजह है कि महुआ मोइत्रा के साथ पुराने विवादों को दरकिनार करते हुए उन्हें फिर से मुख्य सचेतक (Chief Whip) जैसा महत्वपूर्ण पद दिया गया।
पिछले साल जब संगठनात्मक बदलाव हुए थे, तब पार्टी के महासचिव (General Secretary) अभिषेक बनर्जी को संसदीय दल का नेता नियुक्त किया गया था। वह बदलाव तृणमूल में 'नई पीढ़ी' के उदय के रूप में देखा गया था। अब कल्याण बनर्जी की वापसी को पुराने गार्ड्स (Old Guards) की मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी पार्टी के भीतर अनुभवी चेहरों और युवाओं के बीच एक संतुलन बनाना चाहती हैं, ताकि केंद्र सरकार के खिलाफ लोकसभा में मजबूती से पक्ष रखा जा सके।
बैठक के दौरान ममता बनर्जी केवल नियुक्तियों तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी चर्चा की। हालांकि इन चुनावों में पार्टी की स्थिति उम्मीद के मुताबिक नहीं रही, लेकिन ममता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सांसदों को निराश होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कड़ा निर्देश दिया कि सभी सांसद अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों (Constituencies) में लौटें और 'जनसंपर्क' (Public Outreach) को तेज करें। उनका संदेश साफ था कि जनता से दूरी ही हार का कारण बनती है, इसलिए जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करना अनिवार्य है।
दिलचस्प बात यह रही कि कल्याण बनर्जी की पुनर्नियुक्ति पर कालीघाट से बाहर निकलते समय किसी भी सांसद ने खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी। पर्दे के पीछे क्या खिचड़ी पक रही है, इस पर सभी ने चुप्पी साध रखी है। हालांकि, यह साफ है कि आने वाले समय में कल्याण बनर्जी सदन में टीएमसी की आवाज को और बुलंद करेंगे। उनकी नियुक्ति को एक ऐसे रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है जो लोकसभा में विपक्षी एकता और पार्टी के अनुशासन को बनाए रखने में मददगार साबित होगा।
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