शाहपुरा: राजस्थान की मरूधरा अपनी वीरता के साथ-साथ अपनी अद्वितीय प्राकृतिक संपदा के लिए भी जानी जाती है। इस राजस्थान दिवस (30 मार्च) के उल्लास के बीच भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा क्षेत्र से पर्यावरण संरक्षण की एक सुखद तस्वीर उभरकर सामने आई है। यहाँ "रेगिस्तान के सागवान" के नाम से मशहूर और राजस्थान के राज्य पुष्प 'रोहिड़ा' को बचाने और उसकी खोज करने का एक व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। फाल्गुन और चैत्र मास की इस गुलाबी रंगत में जहाँ पूरा प्रदेश उत्सव मना रहा है, वहीं शाहपुरा के ग्रामीण अंचलों में रोहिड़ा के पेड़ केसरिया और पीत आभा बिखेरकर प्रकृति प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं।
वर्ष 1983 में राजस्थान सरकार द्वारा 'राज्य पुष्प' घोषित किया गया रोहिड़ा (वैज्ञानिक नाम: टेकोमेला अण्डूलाटा) विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन जीने की कला सिखाता है। जहाँ भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल कीचड़ और जल में खिलता है, वहीं रोहिड़ा शुष्क और कठोर मरुस्थलीय मिट्टी में अपनी जड़ें जमाकर सुंदर फूल पैदा करता है। इस वृक्ष की ऊँचाई सामान्यतः 5 से 7 मीटर होती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी मजबूत और टिकाऊ लकड़ी है, जिसके कारण इसे 'मारवाड़ का सागवान' भी कहा जाता है। इसके फूलों की महक और सुंदरता न केवल इंसानों को, बल्कि बया, गौरैया, बुलबुल और मधुमक्खियों जैसे जीवों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे स्थानीय जैव विविधता बनी रहती है।
सामान्यतः 'रेगिस्तान के सागवान' के रूप में विख्यात रोहिड़ा का साम्राज्य पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़ और शेखावाटी के रेतीले धोरों तक ही सीमित माना जाता रहा है। वहां की जलवायु और मिट्टी इस वृक्ष के फलने-फूलने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है, लेकिन हाल ही में भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा तहसील क्षेत्र से आई खबरों ने वनस्पति विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों को सुखद आश्चर्य में डाल दिया है। शाहपुरा के कई ग्रामीण अंचलों में रोहिड़ा की प्राकृतिक मौजूदगी ने यह साबित कर दिया है कि अनुकूल परिस्थितियों में यह दुर्लभ वृक्ष अपनी जड़ों का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी कर सकता है। पर्यावरण शोध और सघन निगरानी के दौरान शाहपुरा के अरनियाघोड़ा, ईटमारिया, दौलतपुरा और प्रतापपुरा जैसे गाँवों में रोहिड़ा के स्वस्थ वृक्ष पाए गए हैं। इतना ही नहीं, ढीकोला, लूलांस और भोजपुर के साथ-साथ कनेछनखुर्द एवं कनेछनकलां के क्षेत्रों में भी इसकी केसरिया छटा बिखरी हुई मिली है। इन गाँवों में रोहिड़ा का प्राकृतिक रूप से उगना और जीवित रहना न केवल इस क्षेत्र की मिट्टी की उर्वरता को दर्शाता है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में आ रहे सकारात्मक बदलावों की ओर भी संकेत करता है। स्थानीय स्तर पर इस खोज ने जैव विविधता के संरक्षण की नई उम्मीदें जगा दी हैं।
इस खोज और संरक्षण अभियान के सूत्रधार शाहपुरा के स्थानीय निवासी और शिक्षक दिनेश सिंह भाटी हैं। भाटी पिछले 4-5 वर्षों से इस दुर्लभ वृक्ष के संरक्षण और उसकी निगरानी पर शोधपरक कार्य कर रहे हैं। उनका संकल्प केवल रोहिड़ा तक सीमित नहीं है; वे हर शिक्षण संस्थान में राष्ट्रीय और राज्य प्रतीकों (बरगद, कमल, खेजड़ी और रोहिड़ा) को रोपित करने का मिशन चला रहे हैं। दिनेश सिंह भाटी का कहना है, "प्रकृति हमारी विरासत है। यदि हम आज अपने राज्य पुष्प का संरक्षण नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों में देखेंगी। शाहपुरा की मिट्टी में रोहिड़ा का पनपना इस क्षेत्र की अनुकूल जैव विविधता का संकेत है।"
इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय लोग हैं। किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का एक बड़ा समूह इस मुहिम से जुड़ चुका है। मानसून के दौरान रोहिड़ा के पंखनुमा बीजों को इकट्ठा करना और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर रोपित करना अब ग्रामीणों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। यह सामूहिक प्रयास न केवल पर्यावरण को बचाने का जरिया है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी साबित हो रहा है। राजस्थान दिवस पर शाहपुरा से उठी यह गूंज पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरणा है। रोहिड़ा की यह केसरिया छटा हमें सिखाती है कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी कैसे खिलखिलाया जा सकता है। अगर समाज और व्यक्ति ठान लें, तो बंजर जमीन पर भी सुनहरी हरियाली की वापसी संभव है।
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