Delhi High Court Slams WFI : दिल्ली हाई कोर्ट ने भारत की महिला रेसलर विनेश फोगाट (Vinesh Phogat) को अयोग्य घोषित किए जाने के फैसले को लेकर भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट (delhi high court) ने टिप्पणी की कि देश में मातृत्व का सम्मान किया जाता है, और WFI का अपने ही तय चयन मानदंडों से भटकना बहुत कुछ कहता है।
साथ ही हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह विनेश का मूल्यांकन करने और आगामी एशियाई खेलों के लिए चयन ट्रायल में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करे। पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि 'हमारे देश में मां बनने को सेलिब्रेट किया जाता है, ये कोई गुनाह नहीं है और कुश्ती संघ को बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए।'
गौरतलब है कि विनेश (Vinesh Phogat) मातृत्व अवकाश के बाद वापसी कर रही हैं। WFI ने विनेश को एक 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया था, जिसमें अनुशासनहीनता और डोपिंग-रोधी नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उनसे चार विशिष्ट सवालों के जवाब मांगे गए थे। इसके अलावा, WFI ने विनेश के किसी भी घरेलू प्रतियोगिता में भाग लेने पर 26 जून, 2026 तक प्रतिबंध लगा दिया था। परिणामस्वरूप, विनेश नेशनल ओपन रैंकिंग टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ रहीं। विनेश ने ट्रायल में शामिल होने की अनुमति मांगने के लिए WFI से संपर्क किया था, लेकिन उनकी अपील को नजरअंदाज कर दिया गया।
WFI ने नेशनल ओपन रैंकिंग टूर्नामेंट के ट्रायल में भाग लेने के विनेश के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि WADA संहिता के नियम 5.6.1 के तहत उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही है। WFI के अनुसार, यह नियम अनिवार्य करता है कि संन्यास से लौटने वाले एथलीटों को किसी भी टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा करने के योग्य होने से पहले करीब छह महीने की नोटिस अवधि पूरी करनी होगी।
इसके बाद, विनेश ने कोर्ट (delhi high court) में एक याचिका दायर की, जिसमें एशियाई खेलों के ट्रायल में भाग लेने की अनुमति मांगी गई थी, जो 30 और 31 मई को होने वाले थे। विनेश ने भारतीय कुश्ती महासंघ (Wrestling Federation of India) द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद मामले में हस्तक्षेप करने के लिए कोर्ट से अपील की थी। हालांकि, मामले की पहली सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने कोई भी अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह WFI का पक्ष सुने बिना कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।
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