EV Revolution in Public Transport: भारत में सार्वजनिक परिवहन का चेहरा आने वाले वर्षों में तेजी से बदलने वाला है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने की सरकारी योजनाओं, बढ़ते निवेश और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते देश में इलेक्ट्रिक बसों (ई-बस) की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2035 तक 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। वर्तमान में यह हिस्सा करीब 7 प्रतिशत के आसपास है। गुरुवार को जारी केपीएमजी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का बस सेक्टर अब इलेक्ट्रिफिकेशन के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ई-बसों की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है, जो देश के क्लीन मोबिलिटी मिशन को नई दिशा देगा।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 35,000 से 50,000 बसों की बिक्री होती है। अब इस बाजार में इलेक्ट्रिक बसें तेजी से अपनी जगह बना रही हैं। सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर बसों की खरीद, चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार और बैटरी लागत में कमी इस बदलाव को गति दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में इलेक्ट्रिक बसें न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित होंगी, बल्कि ऑपरेशनल लागत कम होने से परिवहन कंपनियों के लिए भी लाभकारी होंगी। डीजल की तुलना में ई-बसों का रखरखाव सस्ता पड़ता है और लंबी अवधि में यह आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प बनती जा रही हैं।
केपीएमजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में यात्रियों द्वारा तय की जाने वाली कुल दूरी का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा बसों के माध्यम से पूरा होता है। ऐसे में बस सेक्टर का इलेक्ट्रिफिकेशन देश के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बस नेटवर्क तेजी से इलेक्ट्रिक होता है, तो शहरों में प्रदूषण का स्तर घटेगा और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता भी कम होगी। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस सेक्टर को प्राथमिकता दे रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार देशभर में अब तक करीब 62,000 ई-बसों के टेंडर जारी किए जा चुके हैं। इनमें लगभग 46,000 बसों का आवंटन विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत किया गया है। मार्च 2026 तक भारतीय सड़कों पर लगभग 16,300 इलेक्ट्रिक बसें दौड़ रही थीं। हालांकि यह संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन तैनाती और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। भारत में वर्तमान ई-बस तैनाती का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सरकारी टेंडरों और सार्वजनिक परिवहन उपक्रमों के जरिए हुआ है। इससे साफ है कि इस सेक्टर की शुरुआती वृद्धि में सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों की पहल के जरिए वित्त वर्ष 2030 तक करीब 40,000 अतिरिक्त इलेक्ट्रिक बसों के लिए नए टेंडर जारी किए जा सकते हैं। इससे देश के शहरी और अर्ध-शहरी परिवहन नेटवर्क में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। केपीएमजी इंडिया के ऑटोमोटिव पार्टनर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी लीड रोहन राव ने कहा कि भारत में इलेक्ट्रिक बसों की ओर बढ़ता कदम अब केवल नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मोबिलिटी इकोसिस्टम के लिए संरचनात्मक परिवर्तन का अवसर बन चुका है। उन्होंने कहा कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, फाइनेंसिंग इनोवेशन, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और परिचालन दक्षता को मिलाकर एक मजबूत और स्केलेबल इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है। इससे सार्वजनिक और निजी दोनों परिवहन क्षेत्रों को दीर्घकालिक मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक बसों की सफलता के लिए चार्जिंग स्टेशनों का तेज विस्तार बेहद जरूरी है। इसके साथ ही सरकार “मेक इन इंडिया” के तहत बैटरी और ई-बस निर्माण को बढ़ावा दे रही है। स्थानीय स्तर पर निर्माण बढ़ने से लागत कम होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यही वजह है कि कई निजी कंपनियां और राज्य परिवहन निगम अब ई-बसों को अपने फ्लीट का हिस्सा बना रहे हैं।
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