Hari Mangal
आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में अगस्त 2024 में प्रशिक्षु महिला डॉक्टर के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में निचली अदालत ने अभियुक्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। देशभर में चर्चित इस मामले में अपराधी को मृत्युदंड दिलाने हेतु राज्य सरकार और पीड़िता के परिजनों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर जांच को आगे बढ़ाने की मांग की है। पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद अब जनता और पीड़ित परिवार की निगाहें सरकार की प्रभावी पैरवी पर टिकी हैं, ताकि अपराधी को फांसी के फंदे तक पहुंचाया जा सके।
राज्य में नई सरकार के गठन के बाद प्राथमिकताएं बदलती दिख रही हैं। पिछले 15 वर्षों से कथित तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार और अपराध से त्रस्त जनता को अब न्याय की उम्मीद है। हत्या, बलात्कार और भ्रष्टाचार की कई चर्चित घटनाओं ने न केवल बंगाल, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रखा है। इन्हीं में से एक है आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की वह नृशंस घटना, जिसके वर्तमान अदालती निर्णय से समाज का एक बड़ा वर्ग क्षुब्ध है।
9 अगस्त 2024 की सुबह, कोलकाता के राधा गोविंद कार (आर.जी. कर) मेडिकल कॉलेज के सेमिनार हॉल में एक पीजी प्रशिक्षु महिला चिकित्सक का अर्धनग्न शव बरामद हुआ था। शव की स्थिति अत्यंत वीभत्स थी; चेहरे और जननांगों से रक्त बह रहा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इस दरिंदगी की पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़िता के शरीर पर संघर्ष के गहरे निशान थे। अपराधी ने उसकी चीख दबाने के लिए गला और मुंह इतनी जोर से दबाया था कि उसकी थायराइड ग्रंथि तक टूट गई थी। क्रूरता का आलम यह था कि चश्मे के कांच आंखों में धंस गए थे और शरीर पर नाखून के गहरे घाव थे। डॉक्टरों के अनुसार, चोटों की प्रकृति अत्यंत विकृत और अमानवीय थी।
इस जघन्य अपराध को दबाने के लिए अस्पताल प्रशासन और स्थानीय तंत्र ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। प्रारंभिक साक्ष्य स्पष्ट रूप से हत्या की ओर इशारा कर रहे थे, लेकिन कॉलेज के सहायक अधीक्षक ने परिजनों को 'आत्महत्या' की झूठी सूचना दी। परिजनों को घंटों तक शव देखने से रोका गया और प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में भी हीलाहवाली की गई। साक्ष्यों के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ के आरोप लगे। पुलिस की सुस्त कार्रवाई से असंतुष्ट होकर 'फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन' ने 12 अगस्त को देशव्यापी हड़ताल कर दी। अंततः 13 अगस्त को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी, साथ ही यह आशंका भी जताई कि राज्य पुलिस की जांच में सबूत नष्ट हो सकते हैं।
न्याय की मांग कर रहे प्रदर्शनकारी डॉक्टरों और नागरिकों पर 14 अगस्त की रात करीब 1000 लोगों की हिंसक भीड़ ने हमला कर दिया। अस्पताल के आपातकालीन कक्ष, फर्नीचर और सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया गया। आरोप लगे कि यह हमला विरोध को कुचलने और बचे हुए साक्ष्य मिटाने के लिए कॉलेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य और सत्ता के संरक्षण में किया गया एक सुनियोजित षड्यंत्र था।
देशव्यापी आक्रोश और बिगड़ते हालातों को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। 20 अगस्त को सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार, पुलिस और अस्पताल प्रबंधन को कड़ी फटकार लगाई। सर्वोच्च न्यायालय इस संवेदनशील मामले में सीबीआई की प्रगति की निरंतर निगरानी करता रहा।
मामले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी संजय रॉय कोलकाता पुलिस आपदा प्रबंधन बल में नागरिक स्वयंसेवक (सिविक वॉलंटियर) था। जांच में सामने आया कि वह आदतन अपराधी और हिंसक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसकी अस्पताल में तैनाती ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। सीबीआई ने साक्ष्यों से छेड़छाड़ और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में कॉलेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य संदीप घोष और ताला थाना प्रभारी अभिजीत मंडल को भी गिरफ्तार किया।
सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, संजय रॉय के कपड़ों पर पीड़िता का डीएनए और घटनास्थल से उसके ब्लूटूथ डिवाइस जैसे ठोस सबूत मिले थे। 20 जनवरी को अदालत ने उसे दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। हालांकि, पीड़िता के माता-पिता इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। उनका और कई भाजपा नेताओं का मानना है कि इस अपराध में एक से अधिक लोग शामिल थे, जिन्हें पुलिस की प्रारंभिक ढिलाई के कारण बचाया गया।
वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और पीड़िता की मां स्वयं जन प्रतिनिधि के रूप में विधानसभा पहुंची हैं। उन्होंने न्याय को अपना मुख्य मुद्दा बनाया है। अब देखना यह है कि क्या नई जांच से इस हत्याकांड के पीछे छिपे अन्य चेहरे बेनकाब हो पाएंगे और क्या पीड़िता को वह अंतिम न्याय मिल पाएगा जिसकी प्रतीक्षा पूरा देश कर रहा है।
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