संघ का लक्ष्य परमवैभवशाली भारत की स्थापना

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंच परिवर्तन के द्वारा परिवार ,समाज एवं शासकीय व्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन का संदेश दे रहा है। सामाजिक समरसता,के द्वारा समाज में जाति- पाति, उच्च- नीच एवं सामाजिक कुरीतियों को दूर करना है। परिवार प्रबोधन, जो भारतीय जीवन का मूलाधार है, जिसके द्वारा परंपरागत जीवन एवं मूल्यों का क्रियान्वयन है।

संघ का लक्ष्य परमवैभवशाली भारत की स्थापना

संघ का उद्देश्य परमवैभवशाली भारत की स्थापना है। संघ का संकल्प आगामी वर्षों में संगठित हिंदू समाज को और ज्यादा मजबूत करना है। यह अपने संरचनात्मक कार्यक्रमों को समय के सापेक्ष देश एवं काल की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित करता है । संघ बदलते परिवेश में अपने आप को राष्ट्रीयता के आधार पर प्रकट कर रहा है। परिवर्तन एक शाश्वत सत्य है, जो सामूहिक परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुसार अपने को बदल रहा है। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक भारतीय ज्ञान परंपरा में राष्ट्र भौगोलिक एवं राजनीतिक इकाई के रूप में नहीं ,बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता  के रूप में वर्णित है। राष्ट्र एक ऐसी पवित्र भू- संरचना है, जो शताब्दियों से संचित बौद्धिक स्मृतियों ,ज्ञान परंपराओं एवं सामूहिक चेतना का भावनात्मक समूह है। भारत माता वह पावन मातृ भूमि है, जिसके चरणों को स्वयं समुद्र पूजन करता है, जिसने हिमालय को अपने मुकुट के रूप में धारण किया है एवं जो मननशील तपस्वियों एवं तत्त्ववेत्ता दार्शनिकों एवं तेजस्वी ऋषियों की सनातन परंपरा से अलंकृत है। राष्ट्र उन व्यक्तियों का सामूहिक रूप से मनोनैतिक, भावनात्मक लगाव एवं प्रबल आस्था का केंद्र है ।

संघ द्वारा प्रतिपादित दृष्टिकोण प्रासंगिक है, जो राष्ट्र को एक सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत सत्ता का प्रकट इकाई है ,जो कर्तव्यबोध ,सामाजिक समरसता, समाजिक एकात्मकता एवं वैचारिक सतत् को परम वैभव भारत के लिए अतिआवश्यक मानते हैं। भारतमाता के प्रति श्रद्धा की भावना ,भारतीयता के प्रति उन्नयन करने वाला आदर्श आचरण एवं संघ का सभ्यतागत दृष्टिकोण वैभवशाली भारत के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामाजिक समन्वय एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर आधारित परम वैभवशाली भारत के साकार करने की विवेकी परिकल्पना है।

संघ वैश्विक स्तर का सबसे वृहद सामाजिक, गैर - राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संगठन है । इसका परमोलक्ष्य भारत को अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है। संघ ने भारत की मौलिक बुनियाद को सशक्त किया है। भारत के संप्रभुता का संरक्षा किया है, कमजोर वर्गों को सशक्त किया है, एवं सनातन संस्कृति एवं सभ्यता के मूल्यों का उन्नयन किया है। संघ निः स्वार्थ सेवा कार्य का जीवंत प्रतीक है । राष्ट्र का निर्माण व्यक्तियों के उत्तम, मर्यादित एवं संगत चरित्र से होता है। हर स्वयंसेवक समर्पित, कर्तव्यनिष्ठ, सेवा- साधना, परमार्थ भावना एवं आत्माप्रित भाव से समाज के हर क्षेत्र में स्वयंसेवक एवं संघ के अधिकारी कार्य कर रहे हैं। इन सभी का मौलिक उद्देश्य भारत को परमवैभव ,सर्वशक्तिमान एवं वैश्विक गुरु के तौर पर स्थापित करना है। संघ शताब्दी वर्ष का यही संकेत है कि, हिंदू समाज को संगठित करके, समाज की सज्जन शक्तियों को प्रसार करके ,समाज को एकजुट करके, सभी व्यक्तियों में सदभाव व स्नेह का वातावरण उत्पन्न करके राष्ट्रीय एकता एवं सांस्कृतिक गौरव का उन्नयन किया जा सके।

संघ एक ऐसा सामाजिक, गैर- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संगठन है ,जिसके करोड़ों समर्पित स्वयंसेवक व्यक्ति - निर्माण के साथ राष्ट्र - निर्माण के लिए कृतसंकल्पित है । परमपूज्य आद्य सरसंचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने सन् 1925 में परम वैभवशाली भारत की परिकल्पना को पूरा करने के लिए अपने सहयोगी स्वयंसेवकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(संघ )की स्थापना किए थे। तत्कालीन अधिराज के शासकीय व्यवस्थाओं में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं को ब्रिटिश सरकार मनमानी एवं बलपूर्वक दमन कर रही थी। प्रेस की स्वतंत्रता, स्वतंत्र विचरण की स्वतंत्रता एवं भौतिक जीवन को बाधित करनेवाले  नियामकीय अधिकारी तंत्र एवं गैर- जिम्मेदार नौकरशाही अपने असीमित एवं निरंकुश शक्तियों से जनसाधारण की शक्तियों को निर्मातापूर्वक कुचल रहे थे। ऐसे विषम एवं कठिनाई के समय आद्य सरसंचालक ने हिंदुओं में सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता को उन्नयन करके स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार किए। राष्ट्र के प्रति समर्पित भाव से व्यक्ति- निर्माण के महत्ती कार्य को लक्षित करके संघ के स्वयंसेवक समाज एवं राष्ट्र के सभी आयामों एवं प्रकल्पों- सेवा, विद्या, चिकित्सा, छात्र, मजदूर एवं राजनीति में  राष्ट्र सर्वोपरि के मूलमंत्र  को भौतिक जीवन का ध्येय मानकर प्राणप्रण से युक्त होकर राष्ट्र- सेवा में संलग्न रहे हैं। संघ वैश्विक स्तर का अनूठा संगठन है, जो सेवा भाव को साधन मानकर राष्ट्र- सेवा के साध्य को पूर्ण करने के लिए संकल्पित है।

संघ का लक्ष्य भारत को समरसता की और उन्मुख करना है। संघ ने अपने कार्यों के महत्व एवं क्रियाशीलता के कारण 100 वर्षों की शताब्दी यात्रा पूर्ण की है। इस अवधि में सेवा एवं समर्पण की भावना से समाज को जाग्रत किया है। इन कार्यों की उपादेयता से व्यक्ति- निर्माण एवं राष्ट्र- निर्माण में योगदान दिया है। इन कार्यों से समाज में समरसता का वातावरण उत्पन्न हुआ है। इसी उपादेयता के कारण सामयिक परिप्रेक्ष्य एवं सामायिक आवश्यकताओं में संघ अपने सफलता की ओर अग्रसर हैं । अनेक चुनौतियों एवं कठिनाइयों का मुकाबला करने में संघ सक्षम रहा हैं। संघ का मौलिक उद्देश्य समरस भारत का निर्माण करना है, जो जाति एवं संकीर्ण विचारों से ऊपर उठकर सोच सके। संघ समाज की उन्नति के लिए संगठित एवं सबल समाज की स्थापना पर जोर देता है। समाज को संगठित होने के लिए सामूहिक प्रयास करना है एवं समरस भारत के निर्माण के लिए अति आवश्यक है कि , सबको साथ लेकर चला जाए, जिससे समरस एवं समर्थवान भारत  का निर्माण हो सकें। राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में सभी का योजित योगदान होना चाहिए । यह सभी प्रकार के सामाजिक भेदभाव को समाप्त करके समरस समाज के उन्नयन के लिए काम करता है। संघ संगठन ही नहीं ,बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन है।

समाज को जाति- पाति, उच्च- नीच के सामाजिक एवं मानसिक बंधनों से मुक्त करने एवं हिंदू समाज को एक कर संगठित करने का सफल प्रयास है। संघ का मौलिक उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना है । सामयिक में संघ का सामाजिक समरसता का प्रयास अधिक आवश्यक, अधिक उपयोगी एवं अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है। भारत वैश्विक गुरु बनने की ओर अग्रसर है ।ऐसी स्थिति में जाति, भाषा एवं क्षेत्रीय सोच की दीवार को समतल करना होगा।

सामाजिक समरसता में संघ ने जाति एवं जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समाज की एकात्मकता पर जोर दिया है । संघ के पंचम सरसंघचालक पूजनीय के .सी सुदर्शन जी ने हिंदू समाज की कुरीतियों को समाप्त करने में अग्रणी भूमिका निभाएं थे। वे सामाजिक कुरीतियों एवं सामाजिक बुराइयों को विकासात्मक समाज और सशक्त समाज के निर्माण में बाधा मानते थे। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने में समाज की सकारात्मक भूमिका के लिए आवाहन किए थे। संघ ने समय-समय पर व्याख्यान ,कार्यशालाएं ,सामाजिक समरसता को लेकर जन जागरूकता ,सेवा कार्यों को लेकर सामाजिक एकता एवं सहयोग को प्रोत्साहित किया है। संघ का मौलिक उद्देश्य एक समरस, संगठित एवं सशक्त राष्ट्र - निर्माण से हैं।

पर्यावरण संरक्षण, जिसके द्वारा प्रकृति एवं पर्यावरण के मध्य समन्वय स्थापित करके सतत विकासात्मक पहलुओं  को प्राथमिकता दी गई है। पर्यावरण संरक्षण भारत के संविधान के अंतर्गत मौलिक कर्तव्य की श्रेणी में है, जो नागरिकों का मूल कर्तव्य है एवं इसकी प्रकृति नैतिक आधार की है। आत्म परिष्कार एवं स्वाध्याय ,जिसमें प्रत्येक स्वयंसेवक को अपने भीतर अनुशासन एवं साधना का भाव जाग्रत करने की प्रेरणा मिलती है । राष्ट्रीय आत्मनिर्भर एवं एकात्मकता है जिसमें समाज एवं राष्ट्र के प्रति सेवा, समर्पण एवं त्याग का भावना उत्पन्न होता है।

संगठित एवं जाग्रत समाज में नैतिक शक्ति निहित होती है ,जो धर्मानुकूल आचरण करते हुए राष्ट्र को सर्वोच्च संभावनाओं की ओर अग्रसर कर सकती है। सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास एवं अन्य  नि : स्वार्थ नागरिक कर्तव्य के आधार पर परम वैभवशाली भारत की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भारत विकसित भारत @2047 की ओर अग्रसर है। सामूहिक मानवीय चेतना ,सामाजिक सरोकार ,सामाजिक समन्वय, सभ्यतागत समर्पण, राष्ट्र की निः स्वार्थ सेवाएं ,पुनर्निर्माण के लिए प्रेरक संघ एवं समर्पित कार्यकर्ता परम वैभवशाली भारत के लिए कृतसंकल्पित है।

डॉ.बालमुकुंद पाण्डेय 
राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति

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