‘घुसपैठ : सामयिक समस्या और इसका समाधान’
बिना वैध पहचान पत्र के किसी विदेशी का भारत में रहना घुसपैठ माना जाता है। ऐसे लोग अक्सर बिचौलियों या दलालों की मदद से सीमावर्ती राज्यों में प्रवेश कर लेते हैं। निर्वाचन आयोग के ‘विशेष जांच ’ के दौरान बिहार एवं पश्चिम बंगाल में कई ऐसे व्यक्ति पाए गए थे। घुसपैट एवं अन्य कारणों से होने वाले जनसांख्यिकी बदलाव से देश की शांति ,कानून- व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता प्रभावित होती है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा होता है। गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में जनसांख्यिकी संरचना में असामान्य परिवर्तन देखे गए हैं। ऐसे बदलाव से उन क्षेत्रों में रहने वाले भारतीय नागरिकों की जीवन गुणवत्ता और सुविधाएं कम हो रही हैं।
घुसपैठियों से हमारी अस्मिता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता खतरे में है। यह एक संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दा है। उनकी मौजूदगी से भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा होती है । भारत में लगभग -लगभग 20 मिलियन से ज्यादा घुसपैठिए हैं।
1971 में पाकिस्तान से अलग होकर नए बांग्लादेश का गठन हुआ। तब दोनों देशों के बीच झगड़ा बड़ा और सांप्रदायिक तनाव फैला जिससे बहुत से लोग बेघर हों गए। ऐसी स्थिति में दोनों सरकारों की जिम्मेदारी थी कि वह कूटनीति और बातचीत से रास्ते अपना कर “समस्या” का त्वरित हल निकालें ।विस्थापित लोग काम एवं जीवनयापन के लिए भारत के राज्यों में घुसपैठ करके आ गए थे।
बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या देश के कई राज्यों में मौजूद है। गृहमंत्री अमित शाह इस समस्या को लेकर बहुत गंभीर हैं और इसे सुलझाने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि पूरे देश में घुसपैठियों की पहचान की जाएगी और उन्हें भारत से बाहर निकाला जाएगा। इस बार सरकार घुसपैठ के पूरे “तंत्र” को खत्म करने की दिशा में काम कर रही है; क्योंकि यह समस्या केवल सीमा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में फैली हुई हैं।
अवैध घुसपैठ से जनसंख्या का संतुलन बिगड़ रहा है। इसके कारण सीमाओं के पास के क्षेत्र में लोगों की जनसांख्यिकी संरचना बदल रही है । यह राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। कई घुसपैठिए उत्तर- पूर्व और पश्चिम बंगाल में फर्जी तरीके से घुस गए हैं और सरकारी योजनाओं का भी गलत फायदा उठा रहे हैं। ऐसे लोग को देश में लाने, पहचान पत्र बनवाने और अलग-अलग जगह बसाने वाले गिरोह सक्रिय हैं।
बहुत बड़ी संख्या में घुसपैठियों का भारत में आना सुरक्षा , सामाजिक सौहार्द और आर्थिक विकास के लिए “चिंता ” का विषय है। विचारकों और चिंतकों ने इसे “जनसांख्यिकी आक्रमण ” मानते हैं ; क्योंकि उनका कहना है कि यह यहां के मूल नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रताओं पर असर डालते हैं। खासकर बंगाल और असम में घुसपैठियों का बाढ़ है। आंकड़ों के अनुसार, बंगाल में 1951 में मुस्लिम आबादी 5118269 थी, जो 2011 तक बढ़कर 24654825 तक पहुंच गई। असम में 1951 में मुस्लिम आबादी 1995936 से बढ़कर 10679345 हो गई। कुछ प्रतिवेदनों के अनुसार, 1971 के बाद हर दशक में मुस्लिम आबादी में 80% से 85% तक वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की बड़ी संख्या भारत में आ रही हैं।
घुसपैट एक गंभीर और जिम्मेदारी मांगने वाला कारण है, जो आंतरिक अशांति व सुरक्षा संबंधी समस्याओं को घरेलू तौर- तरीकों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। घुसपैठ वर्तमान समय में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जिस तरह भारत सरकार ने भारत की जटिल समस्याओं के समाधान में प्रतिबद्धता दिखाई है, उसी प्रकार घुसपैठ की कैंसर रूपी समस्या के समाधान में तत्परता दिखानी चाहिए। घुसपैठिया देश की राष्ट्रीय संपदा पर अधिकार जमा लेते हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विधि व्यवस्था को चुनौती देते हैं। ये जंगलों और अन्य संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं और कभी-कभी देश विरोधी षडयंत्रों में भी लिप्त होते हैं। भारत का लक्ष्य 2047 तक विकसित देश बनना है। इसके लिए अतिआवश्यक है कि संसाधनों का उचित एवं न्यायपूर्ण अधिकार सुनिश्चित किया जाए। घुसपैठिए अपराधों में संलिपित व्यक्तियों के खिलाफ स्पष्ट कानूनी कार्रवाई और सुरक्षा नीतियां अपनानी चाहिए।
युगल किशोर मिश्र
प्रधानाचार्य,सरस्वती शिशु मंदिर इंटरकालेज, सुल्तानपुर
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