नई दिल्ली: संसद का बजट सत्र महज़ आंकड़ों और योजनाओं का लेखा-जोखा नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक वैचारिक और प्रक्रियात्मक युद्ध का मैदान बन चुका है। सत्र के दूसरे चरण के दूसरे दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक दुर्लभ और गंभीर अध्याय तब जुड़ा, जब विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। एक ओर जहां लोकसभा में माइक्रोफोन बंद करने और पक्षपात के आरोपों ने शोर मचाया, वहीं दूसरी ओर राज्यसभा में 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष ने सदन का परित्याग (वॉकआउट) कर अपनी नाराजगी जाहिर की।
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही फिजां में तल्खी साफ महसूस की जा सकती थी। कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद द्वारा पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव ने सत्ता पक्ष को चौंका दिया, हालांकि इसकी सुगबुगाहट पिछले कुछ दिनों से बनी हुई थी। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के 118 सांसदों के हस्ताक्षरों वाला यह प्रस्ताव केवल एक प्रक्रियात्मक कदम नहीं है, बल्कि यह सदन के भीतर विपक्ष की 'घुटन' का एक औपचारिक दस्तावेज है।
बहस की कमान संभालते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद गौरव गोगोई ने सीधे हमले किए। गोगोई का तर्क था कि लोकतंत्र में संख्या बल से ज्यादा महत्व अभिव्यक्ति का होता है, जिसे वर्तमान व्यवस्था में कुचला जा रहा है। उन्होंने कहा, "विपक्ष के पास 200 के करीब सदस्य होने के बावजूद आज तक उपसभापति (डिप्टी स्पीकर) का पद खाली है। यह न केवल परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि एकतरफा शासन चलाने की जिद है।"
गोगोई के भाषण का सबसे तीखा और हमलावर हिस्सा वह रहा, जब उन्होंने सीधे तौर पर सदन के संचालन में 'तकनीकी हेरफेर' के गंभीर आरोप मढ़े। उन्होंने सत्ता पक्ष को घेरते हुए कहा कि जब भी विपक्ष के नेता राहुल गांधी अपनी बात रखने के लिए खड़े होते हैं, तो रहस्यमयी तरीके से उनका माइक्रोफोन बंद कर दिया जाता है या उन्हें अपनी बात पूरी करने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं दिया जाता। अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए गोगोई ने उन विषयों की एक विस्तृत सूची भी सदन के सामने रखी, जिन पर राहुल गांधी लंबे समय से बोलने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते जैसे आर्थिक मुद्दे हों, या फिर पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की चर्चित पुस्तक और एपस्टीन फाइलों जैसे संवेदनशील रक्षा व वैश्विक सुरक्षा के मामले, विपक्ष का साफ आरोप है कि इन पर चर्चा की अनुमति न देकर सरकार अपनी जवाबदेही से बच रही है।
हालांकि, आसन पर विराजमान जगदंबिका पाल ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें 'निराधार' बताया, लेकिन गोगोई ने तत्काल पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि ये केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि सदन के समक्ष विचाराधीन औपचारिक प्रस्ताव का अभिन्न हिस्सा हैं। गोगोई ने एक ऐतिहासिक तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि अतीत में जब भी लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए, तब सदन में एक 'उपाध्यक्ष' (डिप्टी स्पीकर) की मौजूदगी निष्पक्षता की गारंटी होती थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने उस संवैधानिक सुरक्षा कवच को ही गायब कर दिया है।
उच्च सदन (राज्यसभा) की स्थिति भी अलग नहीं थी। यहाँ लड़ाई 'विशेष गहन संशोधन' (Special Intensive Revision - SIR) यानी मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर थी। विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि कई राज्यों में चुनावी मतदाता सूचियों में धांधली की जा रही है और इसे सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर विपक्षी वोटरों को हटाने की साजिश बताया।
विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने इस प्रक्रिया को सीधे तौर पर "फ्रॉड" (धोखाधड़ी) करार दिया। सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने इस शब्द पर कड़ी आपत्ति जताई और स्पष्ट किया कि चुनाव सुधारों पर पहले ही विस्तार से चर्चा हो चुकी है। सभापति के रुख से असंतुष्ट विपक्षी सांसदों ने सदन के बीचों-बीच नारेबाजी की और फिर एकजुट होकर वॉकआउट कर दिया।
सदन के नेता जे.पी. नड्डा ने विपक्ष के इस व्यवहार की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि विपक्ष चर्चा से भाग रहा है और केवल सुर्खियां बटोरने के लिए सदन की गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है।
इसी हंगामे के बीच आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने नियम 267 के तहत एक महत्वपूर्ण नोटिस दिया। उन्होंने मांग की कि घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा होनी चाहिए। उनका तर्क था कि वैश्विक शिपिंग मार्गों में बढ़ती अनिश्चितता कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा रही है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था खतरे में है। हालांकि, हंगामे के शोर में यह महत्वपूर्ण मुद्दा भी दब गया।
एक तरफ जहां राजनीतिक वार-पलटवार जारी रहा, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने की कोशिश की। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2025-26 के लिए दूसरी खेप की पूरक मांगों (Supplementary Demands for Grants) पर अपना बयान दिया। ग्रामीण विकास और पर्यावरण मंत्रालयों के कामकाज पर भी चर्चा निर्धारित थी, लेकिन जिस तरह का माहौल सदन में बना हुआ है, उसे देखते हुए किसी ठोस नतीजे की उम्मीद कम ही नजर आती है। संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना एक 'अंतिम हथियार' जैसा है। यह इंगित करता है कि सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद के सारे पुल टूट चुके हैं। 9 मार्च को भी कार्यवाही बार-बार स्थगित हुई थी, और कांग्रेस सांसद के. सुरेश का यह बयान कि "यदि सदन चला तो हम प्रस्ताव लाएंगे" यह दर्शाता है कि विपक्ष ने इस बार लंबी लड़ाई का मन बना लिया है।
संसद का यह गतिरोध भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। स्पीकर का पद संवैधानिक रूप से निष्पक्ष माना जाता है, और जब उसी पद पर 'पक्षपात' की उंगली उठती है, तो संस्थागत साख पर आंच आती है। सरकार को चाहिए कि वह डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति जैसी संवैधानिक परंपराओं को पुनर्जीवित कर विपक्ष का विश्वास जीते, वहीं विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध के स्वर में विधायी कार्य पूरी तरह ठप न हों।
अगले कुछ दिन सदन की कार्यवाही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। क्या अविश्वास प्रस्ताव पर कोई सार्थक चर्चा होगी या यह केवल एक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बनकर रह जाएगा? देश की जनता की निगाहें अब लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर की मर्यादा पर टिकी हैं।
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