देशभर में रसोई गैस (LPG) की भारी किल्लत और आपूर्ति में हो रही देरी ने अब राजनीतिक गलियारों में उबाल ला दिया है। गुरुवार, 12 मार्च को संसद परिसर में विपक्षी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हाथों में तख्तियां लिए सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीखी नारेबाजी की और बढ़ती किल्लत के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।
संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही विपक्षी सांसदों ने परिसर में स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शन के दौरान 'नरेंद्र सरेंडर, नरेंद्र गायब, सिलेंडर भी गायब' जैसे नारों से माहौल गरमा गया। इस विरोध प्रदर्शन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा प्रमुख रूप से शामिल रहीं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार आम जनता को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में पूरी तरह विफल रही है। राहुल गांधी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मौजूदा संकट से घबराए हुए हैं और जनता के सवालों का सामना करने से बच रहे हैं।
संसद के भीतर भी एलपीजी के मुद्दे पर भारी हंगामा देखने को मिला। विपक्ष के कड़े तेवरों और शोर-शराबे के कारण लोकसभा की कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट को संभालने में मोदी सरकार नाकाम रही है। खड़गे ने सदन में इस मुद्दे पर पूर्ण चर्चा की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो देश की अर्थव्यवस्था पर इसके बेहद नकारात्मक परिणाम होंगे।
देश में गहराते एलपीजी संकट ने न केवल रसोई का बजट बिगाड़ा है, बल्कि समाज के हर वर्ग को अपनी चपेट में ले लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस संकट के जमीनी प्रभावों का विस्तृत ब्यौरा देते हुए सरकार की नीतियों पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने बताया कि आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि एक घरेलू उपभोक्ता को अपने गैस सिलेंडर की रिफिल के लिए कम से कम 25-25 दिनों तक का लंबा और अनिश्चित इंतजार करना पड़ रहा है। वितरण केंद्रों (Distribution Centers) के बाहर सुबह से ही लोगों की लंबी कतारें लग रही हैं, जो सरकार के सुचारू आपूर्ति के दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस कमी का फायदा उठाकर कई क्षेत्रों में गैस की कालाबाजारी भी धड़ल्ले से शुरू हो गई है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
इस संकट की सबसे गहरी मार हमारे अन्नदाता यानी किसानों पर पड़ी है। खेती के पीक सीजन में ईंधन और उर्वरकों की भारी कमी ने कृषि कार्यों को बुरी तरह बाधित कर दिया है। किसान न केवल महंगे डीजल की मार झेल रहे हैं, बल्कि गैस आधारित उर्वरक संयंत्रों में उत्पादन प्रभावित होने से खाद की किल्लत का भी सामना कर रहे हैं। दूसरी ओर, सूक्ष्म और लघु व्यापार भी इस ऊर्जा संकट की आग में झुलस रहे हैं। ईंधन की अनिश्चितता और गैस की किल्लत के कारण देश के हजारों छोटे रेस्तरां और सड़क किनारे चलने वाले ढाबे अब स्थायी रूप से बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं, जिससे लाखों लोगों की आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
इस पूरे संकट की जड़ें अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन की बाधाओं से भी जुड़ी हुई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी तनाव और संभावित अवरोधों के कारण कतर और अबू धाबी जैसे प्रमुख गैस आपूर्तिकर्ताओं से होने वाला आयात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार ने समय रहते इन भू-राजनीतिक जोखिमों का आकलन नहीं किया, जिसका खामियाजा आज देश के सामान्य नागरिक और किसान को भुगतना पड़ रहा है। ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार की यह विफलता अब एक बड़े मानवीय और आर्थिक संकट का रूप लेती जा रही है।
एलपीजी और ऊर्जा संकट की यह तपिश अब केवल घरेलू रसोई तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर देश के निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर भी साफ दिखने लगा है। विपक्षी दलों के अनुसार, मौजूदा स्थिति भारत की आर्थिक सेहत के लिए एक बड़े खतरे का संकेत है। इस संकट का सबसे बड़ा प्रहार हमारे कृषि निर्यात पर पड़ा है, जहाँ लगभग 60,000 टन बासमती चावल का निर्यात बीच में ही अटक गया है और गेहूं की महत्वपूर्ण खेप भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। यह न केवल विदेशी मुद्रा की आय को रोकता है, बल्कि वैश्विक बाजार में भारत की साख पर भी सवाल खड़े करता है।
महंगाई का मोर्चा भी आम जनता के लिए दुःस्वप्न बनता जा रहा है। कच्चे माल की कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी के कारण दवाओं के दाम में 30% तक का उछाल आया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। औद्योगिक जगत की बात करें तो कपड़ा, स्टील, ऑटोमोबाइल, विमानन ईंधन (ATF), कांच और एफएमसीजी (FMCG) जैसे प्रमुख सेक्टर इस ऊर्जा संकट की वजह से भारी दबाव में हैं। उत्पादन लागत बढ़ने और ईंधन की अनिश्चितता ने इन उद्योगों के पहिये जाम करने शुरू कर दिए हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए इस स्थिति की तुलना 'नोटबंदी' और 'कोविड काल' के कुप्रबंधन से की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार अपनी पिछली असफलताओं और पुरानी गलतियों से सबक लेने में पूरी तरह नाकाम रही है। आज देश एक बार फिर उसी प्रशासनिक पंगुता का शिकार हो रहा है जिसने पूर्व में अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई थी। अब पूरी दुनिया और देश की जनता की निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि वह इस चौतरफा आर्थिक संकट और आपूर्ति की बाधाओं से निपटने के लिए क्या कोई ठोस और प्रभावी कदम उठाती है या जनता को इसी तरह कतारों में खड़ा रहना होगा।
अन्य प्रमुख खबरें
केंद्र सरकार ने कहा- पैनिक बुकिंग से बचें लोग, वैकल्पिक ईंधन विकल्पों पर काम जारी
“ईंधन को लेकर न फैलाएं अफवाहें”: हरदीप सिंह पुरी बोले-देश में पेट्रोल-डीजल और गैस की कोई कमी नहीं
Jammu and Kashmir: आतंक के खिलाफ पुंछ में NIA की बड़ी कार्रवाई, कई जगहों पर की छापेमारी
LPG Gas Cylinder Crisis: दिल्ली हाई कोर्ट की कैंटीन में गहराया LPG गैस संकट, वकीलों का लंच बंद
Tamil Nadu Elections: भाजपा-AIADMK में सीट शेयरिंग फॉर्मूला तय, BJP को मिलेंगी इतनी सीटें