Justice Yashwant Verma Resignation : इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा, जिससे उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया के बीच उनके कार्यकाल का अप्रत्याशित अंत हो गया। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
अपने त्यागपत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा कि वे राष्ट्रपति के गरिमामय पद पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहते, जिन्होंने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए मजबूर किया। उन्होंने गहरे दुख के साथ पद छोड़ने की बात कही और इसे अपने जीवन का सम्मानजनक अवसर बताया। इस्तीफे की प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भी भेजी गई है।
जस्टिस वर्मा मार्च 2025 से विवादों में थे, जब उनके दिल्ली उच्च न्यायालय कार्यकाल के दौरान आवंटित सरकारी आवास के परिसर में स्थित एक आउटहाउस में जली हुई नकदी मिलने का मामला सामने आया था। इस घटना ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए।
जुलाई 2025 में लोकसभा के 145 और राज्यसभा के 63 सांसदों के समर्थन से उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। इस समिति का उद्देश्य आरोपों की निष्पक्ष जांच करना था। बाद में मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनींदर मोहन श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त होने के बाद समिति की संरचना में बदलाव भी किया गया।

जस्टिस वर्मा ने जांच समिति के गठन को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उनकी याचिका में यह तर्क दिया गया कि दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने से पहले संयुक्त परामर्श होना चाहिए था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे, ने उनकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता किसी राहत के पात्र नहीं हैं और जांच प्रक्रिया निष्पक्ष है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कथित नकदी पर जस्टिस वर्मा का “गुप्त या सक्रिय नियंत्रण” था। इस रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की थी। अदालत ने इस आंतरिक जांच को न्यायसंगत और पारदर्शी बताया, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती।
जस्टिस वर्मा का इस्तीफा ऐसे समय में आया है, जब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अंतिम चरणों में पहुंच रही थी। उनके इस कदम को कई लोग संभावित कार्रवाई से पहले जिम्मेदारी से बचने या संस्थागत गरिमा बनाए रखने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। यह मामला न केवल न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण है।
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