वाशिंगटन : आगामी केंद्रीय बजट को लेकर जानकारों का मानना है कि सरकार अपनी मौजूदा दिशा में ही आगे बढ़ेगी। ओआरएफ अमेरिका के वरिष्ठ शोधकर्ता अनित मुखर्जी के अनुसार, भारत के आने वाले केंद्रीय बजट में मोटे तौर पर मौजूदा नीतियों को जारी रखने की उम्मीद है, जिसमें सरकार राजकोषीय मजबूती, मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता और हाई-टेक्नोलॉजी सेक्टर में बढ़े हुए निवेश पर अपना ध्यान बनाए रखेगी।
अनित मुखर्जी ने कहा कि यह सरकार के कार्यकाल का मध्य समय है, इसलिए बजट में किसी बड़े बदलाव की बजाय पहले जैसी नीतियों को ही आगे बढ़ाया जाएगा। उनके मुताबिक, आने वाला बजट निरंतरता का संकेत देगा।
उन्होंने हाल की घोषणाओं का हवाला देते हुए कहा कि सरकार धीरे-धीरे सुधार कर रही है। इसका एक बड़ा उदाहरण ग्रामीण रोजगार से जुड़ी योजना है, जिसे पहले मनरेगा के नाम से जाना जाता था। अब इस योजना का स्वरूप बदला जा रहा है और इसे सीधे पैसे देने वाली योजना की जगह आजीविका से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। मुखर्जी ने कहा, "कुछ घोषणाएं पहले ही हो चुकी हैं, जो काफी अहम हैं। अब यह योजना रोजगार और आजीविका के अवसर बढ़ाने पर केंद्रित हो रही है, न कि केवल लाभ हस्तांतरण तक सीमित रहेगी।
राजकोषीय स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जीएसटी में हाल की कटौती के बावजूद सरकार की आय में बढ़ोतरी बनी रह सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि देश का बाहरी व्यापार क्षेत्र फिलहाल स्थिर है, जिससे आगे के लिए उम्मीद की गुंजाइश है। उनके मुताबिक, अगर वैश्विक व्यापार में बदलाव होते हैं और भारत अपने कुछ पारंपरिक व्यापार समूहों से हटकर नए देशों के साथ व्यापार बढ़ाता है, तो यह देश के लिए फायदेमंद हो सकता है। खासकर अमेरिका की बजाय अन्य देशों की ओर व्यापार बढ़ने से चालू खाते की स्थिति बेहतर हो सकती है।
कुल मिलाकर, मुखर्जी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि वित्त मंत्री मुख्य मैक्रोइकोनॉमिक उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित रखेंगे। उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री लक्ष्य पर नजर रखेंगे। उन्होंने उभरते और रणनीतिक क्षेत्रों में निरंतर सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया, "हम हाई टेक्नोलॉजी, एआई, इन कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निवेश करने के लिए तैयार हैं जहां भारतीय प्रतिस्पर्धात्मकता पहले से ही दिख रही है और उन क्षेत्रों में और अधिक निवेश करने की आवश्यकता होगी।
मुखर्जी ने संशोधित ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में बदलावों पर भी अपनी राय दी, जिसमें उन्होंने कई भारतीय राज्यों में इसके प्रभाव का अध्ययन करने के अपने अनुभव का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट लगभग 20 सालों से चल रहा था और इसके मुख्य स्ट्रक्चर में बहुत कम बदलाव हुआ था, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था और लेबर मार्केट की जरूरतें बदल गई थीं।
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अगर आप देखें कि यह प्रोग्राम कितने समय से चल रहा था, लगभग 20 साल हो गए हैं। सामान्य स्ट्रक्चर... नहीं बदला है, इसलिए बदलाव का समय आ गया था क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था बदल गई है, जरूरतें बदल गई हैं।
उन्होंने इन सुधारों को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया। उनके अनुसार, इससे आंकड़ों और प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक बनाया जा रहा है और राज्यों को इसे लागू करने में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि योजना के मूल उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए।
मुखर्जी ने याद दिलाया कि इस योजना का मकसद लोगों को उस समय रोजगार देना था जब उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है, जैसे खेती के खाली मौसम में या सूखे की स्थिति में। जलवायु परिवर्तन के दौर में रोजगार की गारंटी का यह पहलू आगे भी बेहद अहम रहेगा, भले ही काम का स्वरूप बदल जाए।
उन्होंने अमेरिका की व्यापार और शुल्क नीतियों के असर पर भी बात की। उनका कहना था कि इनका तात्कालिक असर पहले ही दिखाई देने लगा है, क्योंकि ये शुल्क कई महीने पहले लागू किए जा चुके हैं। हालांकि सरकार ने घरेलू उद्योग को राहत देने के लिए कदम भी उठाए हैं। मुखर्जी ने भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर उम्मीद जताई। उन्होंने बताया, "एफटीए को लेकर आशावाद है। अगर ऐसा कोई समझौता होता है, तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार के माहौल पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
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