नई दिल्ली: वैश्विक राजनीति (Global Politics) के रंगमंच पर दक्षिण-पूर्व एशिया को लेकर एक बहुत बड़ी बिसात बिछाई जा चुकी है। म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग पांच दिनों के बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे हैं। इस ऐतिहासिक यात्रा के पहले ही चरण में सोमवार को देश की प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में म्यांमार के राष्ट्राध्यक्ष का बेहद गर्मजोशी और राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच हुई यह उच्च स्तरीय मुलाकात सिर्फ शिष्टाचार तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने सदियों पुराने ऐतिहासिक संबंधों को एक नई और बेहद आक्रामक रणनीतिक दिशा (Strategic Direction) दे दी है।
राष्ट्रपति मुर्मु ने बातचीत के दौरान साफ तौर पर कहा कि भारत और म्यांमार के बीच का रिश्ता केवल कूटनीति के कागजों पर नहीं लिखा गया है, बल्कि इसकी जड़ें हमारी साझी बौद्ध विरासत (Buddhist Heritage) और सदियों पुराने जन-जन के जुड़ाव (People-to-People Connect) में गहराई से धंसी हुई हैं। राष्ट्रपति ने इस बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया कि म्यांमार भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा और एकमात्र जमीनी प्रवेश द्वार (Gateway to Southeast Asia) है। भारत की विदेश नीति में म्यांमार का स्थान कितना ऊंचा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नई दिल्ली ने म्यांमार के साथ अपने रिश्तों को अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जोड़कर देखना शुरू कर दिया है।
राष्ट्रपति भवन में औपचारिक मुलाकात के बाद म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग सीधे हैदराबाद हाउस पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। पीएम मोदी और राष्ट्रपति ह्लाइंग के बीच बंद कमरों में हुई इस मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बेहद सधे हुए शब्दों में चीन का नाम लिए बिना यह साफ कर दिया कि भारत अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighborhood First) यानी पड़ोसी पहले की नीति और 'एक्ट ईस्ट' नीति (Act East Policy) के तहत म्यांमार को अपने सबसे खास रणनीतिक साझीदार के रूप में देखता है।
प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय वार्ता के दौरान व्यापार, सीमावर्ती सुरक्षा सहयोग (Security Cooperation), आधारभूत संरचना विकास परियोजनाओं और क्षमता निर्माण जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। सूत्रों की मानें तो इस बैठक में म्यांमार के भीतर चल रही आंतरिक उथल-पुथल और शांति स्थापना को लेकर भी गंभीर मंथन हुआ। पीएम मोदी ने म्यांमार के राष्ट्रपति को भरोसा दिलाया कि भारत पड़ोसी देश में पूरी तरह से शांति, स्थिरता और लोकतंत्र की बहाली के लिए हर संभव सहयोग देने को तैयार है। भारत ने म्यांमार के साथ संघीय शासन व्यवस्था और आर्थिक प्रगति के अपने समृद्ध अनुभवों को साझा करने की भी खुली पेशकश की है।
यह कोई आम राजनयिक दौरा नहीं है। ऐसे समय में जब हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में भू-राजनीतिक समीकरण बड़ी तेजी से बदल रहे हैं, म्यांमार के राष्ट्रपति का 5 दिनों के लिए भारत आना कई मायनों में ऐतिहासिक है। भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1,600 किलोमीटर से ज्यादा लंबी खुली जमीनी सीमा है, जो भारत के कई पूर्वोत्तर राज्यों से सटी हुई है। इसके साथ ही दोनों देश बंगाल की खाड़ी में एक लंबी समुद्री सीमा भी साझा करते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद पर लगाम लगाने और सीमा पार से होने वाली अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए म्यांमार की सेना और वहां की सरकार का सहयोग भारत के लिए ऑक्सीजन की तरह काम करता है।
इसके अलावा, भारत म्यांमार के जरिए कई बड़ी विकास परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिसमें कालादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (Kaladan Multi-Modal Project) और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग (Trilateral Highway) शामिल हैं। ये परियोजनाएं भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से जोड़ देंगी, जिससे इस पूरे इलाके की आर्थिक तकदीर बदल जाएगी। दिल्ली के गलियारों में हो रही इस हलचल से निश्चित रूप से उन ताकतों के पेट में दर्द शुरू हो गया है, जो इस क्षेत्र में अपनी चौधरहट कायम करना चाहती हैं। म्यांमार के राष्ट्रपति की यह यात्रा दोनों देशों के बीच केवल आर्थिक और व्यापारिक पहियों को गति नहीं देगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और शक्ति का नया संतुलन भी पैदा करेगी।
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