Generic Drugs असर में ब्रांडेड से ज़रा भी कम नहीं, केरल की स्टडी ने तोड़ा महंगी दवाओं का भ्रम

खबर सार :-
Generic Drugs : केरल में डॉ एब्बी फिलिप्स के नेतृत्व में हुए एक वैज्ञानिक शोध में खुलासा हुआ है कि सस्ती जेनेरिक दवाएं असर और शुद्धता में महंगी ब्रांडेड दवाओं से ज़रा भी कम नहीं हैं। जानिए कैसे जेनेरिक दवाएं बचा सकती हैं आपके सालाना हजारों रुपये।
Generic Drugs असर में ब्रांडेड से ज़रा भी कम नहीं, केरल की स्टडी ने तोड़ा महंगी दवाओं का भ्रम
खबर विस्तार : -

Generic Drugs vs Branded Drugs : अक्सर जब हम किसी डॉक्टर के क्लिनिक से बाहर निकलते हैं, तो हाथ में थमा पर्चा सीधे किसी बड़ी फार्मेसी की तरफ ले जाता है। मन में एक ही बात होती है- 'दवा महंगी है, तो अच्छी ही होगी।' लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या जेब ढीली करने के बाद मिलने वाली ब्रांडेड दवा, जन औषधि केंद्र पर मिलने वाली सस्ती दवा से ज्यादा ताकतवर होती है? सालों से आम आदमी और डॉक्टरों के बीच बहस का विषय रहे इस सवाल का अब वैज्ञानिक और बेहद सटीक जवाब सामने आ चुका है। केरल की संस्था 'फ्रंटियर्स इन फार्माकोलॉजी' की एक हालिया और बेहद चौंकाने वाली स्टडी ने इस पूरी धारणा को पलट कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर 'लीवर डॉक्टर' के नाम से मशहूर डॉ. एब्बी फिलिप्स और सात अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने एक जमीनी रिसर्च की। इस रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि बाजार में मिलने वाली सस्ती जेनेरिक दवाएं अपनी गुणवत्ता और असर में बड़ी-बड़ी कंपनियों की ब्रांडेड दवाओं से ज़रा भी उन्नीस नहीं हैं। दोनों का काम करने का तरीका और शुद्धता बिल्कुल बराबर है।

Generic Drugs vs Branded Drugs :131 नमूनों की प्रयोगशाला में हुई अग्निपरीक्षा

इस शोध को करने का तरीका बहुत ही व्यावहारिक और निष्पक्ष था। डॉक्टरों की टीम ने केरल के अलग-अलग जिलों से रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली 22 तरह की दवाओं के कुल 131 नमूने खरीदे। ये वो दवाएं थीं जो अमूमन हर घर में खाई जाती हैं- जैसे डायबिटीज, दिल की बीमारी, इन्फेक्शन, बदन दर्द और पेट की एसिडिटी को ठीक करने वाली गोलियां। दवाएं खरीदने के लिए डॉक्टरों ने किसी एक दुकान को नहीं चुना। उन्होंने सरकारी जन औषधि केंद्रों, जेनेरिक दवा काउंटरों और महंगी से महंगी कॉर्पोरेट फार्मेसियों सहित सात अलग-अलग बिक्री केंद्रों से ये दवाएं जुटाईं। सबसे खास बात यह रही कि इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए जनता से पैसा (क्राउड फंडिंग) जुटाया गया था, ताकि किसी भी दवा कंपनी का इस पर दबाव न रहे। इसके बाद खेल शुरू हुआ शुद्धता की जांच का। सभी 131 नमूनों की कोडिंग की गई ताकि जांच करने वाली लैब को यह पता न चल सके कि कौन सी दवा किस ब्रांड की है या उसकी कीमत क्या है। इन दवाओं को देश की एक शीर्ष सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में भेजा गया। वहां 'भारतीय औषध संहिता' (Indian Pharmacopoeia 2022) के कड़े मानकों पर इन सभी का टेस्ट हुआ।

Generic Drugs vs Branded Drugs : चौंकाने वाला नतीजा: 100 फीसदी पास हुईं सस्ती दवाएं

जब प्रयोगशाला से रिपोर्ट आई, तो वह आंखें खोलने वाली थी। जांच में शामिल सभी 131 दवा के नमूने क्वालिटी टेस्ट में शत-प्रतिशत यानी 100 फीसदी खरे उतरे। कोई भी दवा फेल नहीं हुई। रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि दवा चाहे किसी सरकारी केंद्र से 5 रुपये में खरीदी गई हो या किसी चमचमाती दुकान से 50 रुपये में, दोनों के अंदर मौजूद सक्रिय औषधीय तत्व (Active Ingredient), उनकी शुद्धता और मरीज के पेट में जाकर घुलने की क्षमता में रत्ती भर का भी अंतर नहीं था। इस अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि आज तक भारत में इस तरह सीधे बाजार से ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं को एक साथ खरीदकर, उनकी कीमतों और लैबोरेट्री नतीजों की ऐसी सीधी तुलना कभी नहीं की गई थी।

दवाओं की गुणवत्ता का रिपोर्ट कार्ड:

  • कुल जाँचे गए नमूने: 131
  • गुणवत्ता में सफल: 131
  • सफलता की दर: 100%
  • जेनेरिक और ब्रांडेड में अंतर: 0%

Generic Drugs vs Branded Drugs : असर में बराबर, लेकिन कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क

गुणवत्ता में तो दोनों दवाएं बराबर निकलीं, लेकिन जब डॉक्टरों की टीम ने इनकी कीमतों का हिसाब लगाया, तो आंकड़े डराने वाले थे। भारत जैसे देश में जहां आम परिवारों के स्वास्थ्य बजट का लगभग दो-तिहाई (66 फीसदी) हिस्सा केवल दवाइयां खरीदने में चला जाता है, वहां यह अंतर जिंदगी बदलने वाला साबित हो सकता है। स्टडी में सामने आया कि जेनेरिक दवाएं औसतन ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 48.6 प्रतिशत तक सस्ती हैं। कुछ मामलों में तो महंगाई की सीमा ही पार हो गई। रिसर्च के अनुसार, एक ही साल्ट (दवा) का सबसे महंगा ब्रांड, उसी दवा के सबसे सस्ते जेनेरिक विकल्प से 13.9 गुना अधिक महंगा बिक रहा था। उदाहरण के लिए, दर्द निवारक (पेन किलर) दवा का जो पत्ता जेनेरिक में कौड़ियों के भाव मिल रहा था, ब्रांडेड कंपनियों ने उस पर भारी-भरकम मुनाफा जोड़कर उसे बेहद महंगा बना दिया था, जबकि दोनों का असर शरीर पर एक समान ही होना है।

Generic Drugs vs Branded Drugs : लीवर की जेनेरिक दवा से सालभर में बचेंगे 16,000 रुपये

अध्ययन के दौरान यह भी देखा गया कि जांच की गई 22 दवाओं में से 18 दवाओं के मामले में केंद्र सरकार के 'जन औषधि केंद्र' सबसे किफायती साबित हुए। अगर कोई मरीज ब्रांडेड दवाओं को छोड़कर डॉक्टरों की सलाह पर इन केंद्रों से दवाएं लेता है, तो उसकी सालाना बचत का आंकड़ा हजारों में जाता है। एक बड़ा उदाहरण लीवर की बीमारी के इलाज में काम आने वाली दवाओं का है। स्टडी के मुताबिक, एक मरीज केवल लीवर की जेनेरिक दवा खाकर ही सालभर में अपने 16,000 रुपये से ज्यादा की सीधी बचत कर सकता है। इसी तरह शुगर और बीपी के मरीज भी हर महीने हजारों रुपये बचा सकते हैं, जिससे उन पर मानसिक और आर्थिक दबाव बेहद कम हो जाएगा।

Generic Drugs vs Branded Drugs : डॉक्टरों की कलम और मरीजों की जेब का सीधा नाता

अमूमन देखा जाता है कि संपन्न तबके के लोग महंगी दवाएं आसानी से खरीद लेते हैं, लेकिन संकट गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने आता है। कई बार दवा महंगी होने के कारण मरीज अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं, जो उनकी जान पर भारी पड़ता है। लंबे समय तक बिना नागा किए दवा खाना ही गंभीर बीमारियों से बचने का एकमात्र रास्ता है।

यहीं पर हमारे देश के डॉक्टरों की भूमिका सबसे बड़ी हो जाती है। चूंकि पर्चा डॉक्टर ही लिखता है, इसलिए उनके मन से भी यह हिचक निकलनी जरूरी है कि सस्ती दवा काम नहीं करेगी। केरल का यह वैज्ञानिक अध्ययन डॉक्टरों को भी एक बड़ा और साफ संदेश देता है कि मरीज को जेनेरिक दवा लिखकर देना उनके इलाज की गुणवत्ता से समझौता करना कतई नहीं है। बल्कि यह एक डॉक्टर का अपने मरीज के प्रति आर्थिक और मानवीय सहयोग है। इस पूरे शोध का सबसे बड़ा निचोड़ यही है कि 'सस्ता' होने का मतलब हमेशा 'घटिया' होना नहीं होता। अगर देश में दवा बाजार के रेगुलेटर (औषधि नियंत्रक) सक्रिय रहें और दवाओं के मानकों पर पैनी नजर रखें, तो देश के हर नागरिक को बेहद कम कीमत में बेहतरीन और जान बचाने वाली दवाइयां आसानी से मिल सकती हैं। अब वक्त आ गया है कि हम दवाओं को नाम या ब्रांड से नहीं, बल्कि उसके काम से पहचानें।

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