Uttar Pradesh Paan Farming: उत्तर प्रदेश में पान केवल एक फसल नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बनारसी पान की पहचान देश-दुनिया में है, जबकि लखनऊ की नवाबी संस्कृति में पान विशेष स्थान रखता है। पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कई जिलों में हजारों परिवार पान की खेती से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। हालांकि बदलते समय के साथ यह पारंपरिक खेती गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। विशेष रूप से प्रतापगढ़ जिले के पान किसानों की स्थिति इस संकट को साफ तौर पर उजागर करती है।
प्रतापगढ़ की पट्टी तहसील लंबे समय से पान उत्पादन का प्रमुख केंद्र रही है। स्थानीय किसानों के अनुसार इलाके में करीब 30 हजार पान किसान सक्रिय हैं, जबकि चौरसिया समाज के लगभग 55 हजार लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस खेती से जुड़े हैं। लेकिन खेती की बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार की समस्याओं के कारण अब किसानों का इस व्यवसाय से मोहभंग होने लगा है।
पान की खेती सामान्य फसलों की तुलना में अधिक श्रम और पूंजी मांगती है। इसके लिए विशेष छायादार ढांचे, जिन्हें स्थानीय भाषा में बरेजा या भीटा कहा जाता है, तैयार किए जाते हैं। बांस, पैरा और सरई की मदद से बनाए जाने वाले ये ढांचे दो वर्षों तक चलते हैं, लेकिन इनके निर्माण पर भारी खर्च आता है। किसानों का कहना है कि खेती में इस्तेमाल होने वाली अधिकांश सामग्री बाजार से खरीदनी पड़ती है। बांस की कीमत 250 से 300 रुपये तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा भूमि किराया, सिंचाई, श्रम और परिवहन लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पहले जहां पान की खेती लाभदायक मानी जाती थी, वहीं अब किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

पान की खेती वर्तमान में उद्यान विभाग के अंतर्गत आती है, लेकिन किसान इसे कृषि का दर्जा देने की मांग लंबे समय से कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि कृषि फसलों की तरह उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), आसान ऋण और व्यापक बीमा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। फसल नष्ट होने की स्थिति में अधिकांश किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाता। किसानों का आरोप है कि बीमा और सहायता योजनाओं का लाभ सीमित लोगों तक ही पहुंच पाता है। यही वजह है कि कई किसान आर्थिक जोखिम उठाने के बजाय इस खेती से दूरी बना रहे हैं।
प्रतापगढ़ के जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा के अनुसार वर्ष 2025-26 में पान किसानों के लिए अनुदान और प्रशिक्षण का लक्ष्य पहले की तुलना में कम मिला है। विभाग को केवल दो किसानों को बरेजा निर्माण सहायता और 50 किसानों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि महोबा स्थित राष्ट्रीय पान अनुसंधान केंद्र में किसानों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है। हालांकि विभाग का मानना है कि कई किसान प्रशिक्षण लेने के बावजूद पारंपरिक तरीकों पर ही निर्भर रहते हैं, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
पान की खेती जलवायु के प्रति बेहद संवेदनशील मानी जाती है। किसानों के अनुसार अत्यधिक गर्मी, असामान्य बारिश और कड़ाके की ठंड फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। गर्मियों में एक दिन में कई बार सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि सर्दियों में पत्तियों की हरियाली प्रभावित हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने पान उत्पादन की अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है और उत्पादन जोखिमपूर्ण होता जा रहा है।

प्रतापगढ़ के पान किसानों की एक बड़ी समस्या स्थानीय मंडी का अभाव भी है। किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए वाराणसी, जौनपुर, सुल्तानपुर और अन्य शहरों तक जाना पड़ता है। परिवहन पर अतिरिक्त खर्च के कारण उन्हें उचित लाभ नहीं मिल पाता। किसानों का दावा है कि व्यापारी कम कीमत पर पान खरीदकर कई गुना अधिक मूल्य पर बेचते हैं। उद्यान विभाग ने जिले में पान प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा है। यदि यह योजना लागू होती है तो किसानों को मूल्य संवर्धन का लाभ मिल सकता है।
भारत में एक लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में पान की खेती होती है। असम, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। उत्तर प्रदेश में वाराणसी, जौनपुर, प्रतापगढ़, गाजीपुर, सुल्तानपुर, लखनऊ, महोबा, बांदा और रायबरेली समेत कई जिलों में पान किसानों की बड़ी आबादी है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2022-23 में भारत से लगभग 3,440 मीट्रिक टन पान का निर्यात हुआ था, जिसकी कीमत 6.21 मिलियन डॉलर रही। हालांकि 2024-25 में निर्यात घटकर 1,594.24 मीट्रिक टन रह गया। वर्तमान में ब्रिटेन, यूएई, मलेशिया, भूटान, श्रीलंका और मालदीव भारतीय पान के प्रमुख आयातक देशों में शामिल हैं।
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