TCS को US में बड़ा झटका: Supreme Court ने खारिज की याचिका, 220 मिलियन डॉलर का वित्तीय बोझ
खबर सार :-
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद टीसीएस की कानूनी लड़ाई लगभग समाप्त हो गई है। कंपनी को अब 220 मिलियन डॉलर तक का वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा। हालांकि टीसीएस ने पहले से पर्याप्त प्रावधान किया हुआ था, फिर भी यह मामला वैश्विक आईटी कंपनियों के लिए बौद्धिक संपदा और ट्रेड सीक्रेट संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है।
खबर विस्तार : -
US Supreme Court Verdict: भारत की दिग्गज आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को अमेरिका में चल रहे ट्रेड सीक्रेट विवाद में बड़ा कानूनी झटका लगा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने निचली अदालतों के फैसले की समीक्षा की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद टीसीएस को करीब 220 मिलियन डॉलर का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसमें हर्जाना, ब्याज और कानूनी खर्च शामिल हैं।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज कंपनी ने मंगलवार को शेयर बाजार को दी गई जानकारी में इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि अब उसे अतिरिक्त प्रावधान करना होगा, जिसका असर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों पर दिखाई देगा।
सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी सुनवाई की अनुमति
टीसीएस ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि यूनाइटेड स्टेट्स सुप्रीम कोर्ट ने 15 जून 2026 को उसकी ‘रिट ऑफ सर्टिओरारी’ याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका यूनाइटेड स्टेट्स कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फिफ्थ सर्किट के फैसले की समीक्षा के लिए दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने का अर्थ है कि फिफ्थ सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स का फैसला अंतिम रूप से बरकरार रहेगा। इससे डीएक्ससी टेक्नोलॉजी के पक्ष में दिया गया 168 मिलियन डॉलर का हर्जाना आदेश प्रभावी रहेगा और टीसीएस को अब कानूनी रूप से उसका अनुपालन करना होगा।
पहले ही किया था 150 मिलियन डॉलर का प्रावधान
कंपनी ने बताया कि अकाउंटिंग मानकों के अनुरूप उसने इस मामले से जुड़े संभावित दायित्व को देखते हुए पहले ही 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रावधान अपने खातों में कर रखा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद अब कंपनी को नुकसान, ब्याज और कानूनी खर्चों के लिए अतिरिक्त 70 मिलियन डॉलर का प्रावधान करना पड़ेगा। यह राशि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में एकमुश्त असाधारण खर्च (Exceptional Item) के रूप में दर्ज की जाएगी। इस प्रकार कुल वित्तीय प्रभाव लगभग 220 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो भारतीय मुद्रा में हजारों करोड़ रुपये के बराबर है।
क्या है पूरा ट्रेड सीक्रेट विवाद?
यह मामला वर्ष 2019 में अमेरिका के डलास स्थित फेडरल कोर्ट में दायर मुकदमे से जुड़ा है। मुकदमा डीएक्ससी टेक्नोलॉजी की पूर्व कंपनी कंप्यूटर साइंसेज कॉर्पोरेशन (CSC) द्वारा दायर किया गया था। कंपनी का आरोप था कि टीसीएस ने बीमा क्षेत्र की कंपनी ट्रांसअमेरिका के लगभग 2,200 कर्मचारियों को नियुक्त किया और उनके माध्यम से प्रतिस्पर्धी लाइफ इंश्योरेंस प्लेटफॉर्म विकसित करने के लिए गोपनीय व्यावसायिक जानकारी तथा ट्रेड सीक्रेट्स का उपयोग किया। वादी पक्ष का दावा था कि इन कर्मचारियों के जरिए प्राप्त जानकारी ने टीसीएस को अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ दिया, जिससे डीएक्ससी के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचा।
जूरी ने लगाया था 210 मिलियन डॉलर का जुर्माना
वर्ष 2023 में मामले की सुनवाई के दौरान जूरी ने निष्कर्ष निकाला कि टीसीएस ने जानबूझकर ट्रेड सीक्रेट्स का दुरुपयोग किया। इसके आधार पर जूरी ने कंपनी पर 210 मिलियन डॉलर का भुगतान करने की सिफारिश की थी। हालांकि, बाद में यूएस डिस्ट्रिक्ट जज ब्रेंटली स्टार ने इस राशि को घटाकर 168 मिलियन डॉलर कर दिया। इसमें 56 मिलियन डॉलर वास्तविक हर्जाने और 112 मिलियन डॉलर दंडात्मक हर्जाने (Punitive Damages) के रूप में शामिल थे। यह फैसला टीसीएस के लिए राहत जरूर था, लेकिन कंपनी ने इसके खिलाफ भी कानूनी लड़ाई जारी रखी।
अपील अदालत से भी नहीं मिली राहत
टीसीएस ने फैसले को चुनौती देते हुए फिफ्थ यूएस सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स का दरवाजा खटखटाया। कंपनी ने तर्क दिया कि डीएक्ससी वास्तविक आर्थिक नुकसान को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाई है और ‘अनुचित लाभ’ के आधार पर हर्जाना देना उचित नहीं है। इसके अलावा कंपनी ने दंडात्मक हर्जाने की राशि को भी अत्यधिक बताया था। लेकिन वर्ष 2025 में अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद टीसीएस ने अंतिम विकल्प के तौर पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसे अब खारिज कर दिया गया है।
निवेशकों और बाजार की नजरें वित्तीय प्रभाव पर
विश्लेषकों का मानना है कि टीसीएस जैसी मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनी के लिए 220 मिलियन डॉलर का प्रभाव प्रबंधनीय है, लेकिन इससे कंपनी के तिमाही लाभ पर दबाव देखने को मिल सकता है। निवेशक अब इस बात पर नजर रखेंगे कि कंपनी इस असाधारण खर्च के बावजूद अपने लाभांश, नकदी प्रवाह और भविष्य की रणनीतियों को किस प्रकार संतुलित करती है।
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