देवरियाः 'पतहर' पत्रिका के तत्वाधान में नागरी प्रचारिणी सभा के तुलसी सभागार में विभूति नारायण ओझा द्वारा संपादित आलोचनात्मक पुस्तक ''ग़ज़लकार डीएम मिश्र : सृजन के समकालीन सरोकार'' का लोकार्पण सहपरिचर्चा एवं काव्य पाठ का आयोजन गुरूवार 24 अप्रैल को संपन्न हुआ।
मुख्य अतिथि नगर पालिका अध्यक्ष अलका सिंह ने कहा कि ग़ज़ल लंबी कहानियों की रूप होती है। डीएम मिश्र की ग़ज़लों में पूरी दुनिया समाहित है। उन्होंने कहा कि श्री मिश्र की रचनाएं समाज को नई रोशनी देती हैं। हमारी कामना है कि यह निरंतर साहित्य सृजन में सक्रिय रहे और नये रचना संग्रह के साथ पुनः देवरिया आएं। कार्यक्रम को विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, विचारक, संपादक कौशल किशोर ने कहा कि डीएम मिश्र समकालीन गज़लकार हैं। इनकी गजलें हिन्दी की कविता की तरह समकाल से मुठभेड़ करती हैं। इनमें जीवन का एहसास है। गांव की मिट्टी और आबोहवा है। समाज का द्वंद है। सत्ता और व्यवस्था से टकराती हैं। यदि प्रेम और करुणा है तो वहीं प्रतिरोध और अन्याय का प्रतिकार है। इनके यहां जो प्रतिरोध है, वह विरोध के आगे की चीज है। इनकी समझ है कि यदि अन्याय का प्रतिकार नहीं हुआ तो अत्याचारियों का मनोबल बढ़ेगा। कौशल किशोर ने डीएम मिश्र की अनेक गजलों को उद्धृत करते हुए कहा कि दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परंपरा में इनकी गजलों को देखा जा सकता है। जहां व्यवस्था की विद्रूपताओं का उद्घाटन है, वहीं लोक जीवन के खूबसूरत बिम्ब और श्रम का सौंदर्य है। ये बदलाव की उम्मीद नहीं छोड़ती हैं। कहती हैं ’लंबी है ये सियाहरात जानता हूं मैं/उम्मीद की किरन मगर तलाशता हूं मैं/सहरा में खड़ा हूं चमन की आस है मगर/कोई नया गुलाब खिले चाहता हूं मैं’। वर्तमान में यह इच्छा-आकांक्षा बड़े काम की है।
समारोह में बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. चतुरानन ओझा ने कहा कि डी एम मिश्र का सरोकार मेहनत और पसीने वालों से है। इनकी रचनाएं सत्ता के गलियारों में आशिकी के नगमे गाने और सुनने वालों के लिए किसी काम की नहीं है। संवादधर्मिता इसका खास गुण है। अंदाज बतियाने का है, कहने का है। यह सीधे लोगों तक पहुंचती है। गजलों के लिए किसी आलोचक या व्याख्याकार की जरूरत नहीं है। जिस तरह दुष्यंत और अदम की गजलें जबान पर चढ़ जाती है, मिश्र जी की गजलों में भी यही खासियत है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए साहित्यकार अचल पुलस्तेय ने कहा कि डी एम मिश्र ग्रामीण जीवन के हालात को लेकर ग़ज़लें लिखी हैं, वे जनवादी कवि है। समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार इंद्र कुमार दीक्षित ने कहा कि डीएम मिश्र की ग़ज़लें आम बोल-चाल की भाषा में लिखी गई हैं, जो ग़ज़लों में नजाकत व नफासत की उम्मीद करते हैं, वे निराश होंगे। इनकी ग़ज़लें हिन्दी की दुनिया में तेजी से लोकप्रियता पा रही हैं। वे मिट्टी की महक की बात ग़ज़लों में करते हैं। वे श्रम में सौंदर्य की तलाश करने वाले ग़ज़लकार हैं।
डीएम मिश्र ने ’पतहर’ और इसके संपादक विभूति नारायण ओझा और उनकी टीम के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मौजूदा दौर ऐसा है, जहां हर अच्छी चीज को गंदा किया जा रहा है, ऐसे में झूठ को बेनकाब करना, अन्याय का विरोध और सच के पक्ष में खड़ा होना जरूरी है। इस मौके पर उन्होंने कई गजलें सुनाईं। एक ग़ज़ल में वह कहते हैं- ’फूल तोड़े गये टहनियां चुप रही, पेड़ काटा गया बस इसी बात पर।’ कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत ’पतहर’ पत्रिका के प्रबंध संपादक चक्रपाणि ओझा ने किया, वहीं संचालन कवि सरोज पांडे ने तथा आभार ज्ञापन ’पतहर’ के संपादक विभूति नारायण ओझा ने किया। इसके पूर्व विशिष्ट अतिथि डॉ. डीएम मिश्र को ’पतहर’ पत्रिका की तरफ से “मान पत्र“ देकर नगर पालिका अध्यक्ष और संपादक विभूति नारायण ओझा ने सम्मानित किया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उपस्थित कवियों सर्व कौशल किशोर मणि, योगेंद्र पांडेय, दयाशंकर कुशवाहा, प्रेम कुमार मुफलिस, सौदागर सिंह, अंजलि अरोड़ा, सरोज कुमार पांडेय, इंद्र कुमार दीक्षित, क्षमा श्रीवास्तव, विकास तिवारी, योगेंद्र तिवारी योगी आदि कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ भी किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से किसान नेता शिवाजी राय, सुभाष राय, सर्वेश्वर ओझा, सौरभ मिश्रा, राम प्रकाश सिंह, सत्येंद्र यादव, विकास दुबे, कृष्णानंद पांडेय, सत्य प्रकाश सिंह, संतोष, डॉक्टर आलोक पांडेय, नित्यानंद त्रिपाठी, रानू पांडे, करन त्रिपाठी , सोनू सुजीत, विकास तिवारी, रमेश कुमार, क्रांति कुमार, राकेश कुमार, प्रभानंद तिवारी आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम का समापन पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा सैलानियों पर हमले के दौरान मारे गए लोगों के प्रति 2 मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई। शोक संवेदना में कहा गया कि पीड़ित परिवारों के इस असह्य दुःख में हम सभी शामिल हैं।
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