Diesel और ATF Export पर सरकार सख्त: विंडफॉल टैक्स बढ़ा, पेट्रोल शुल्क यथावत

खबर सार :-
डीजल और एटीएफ के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाने का केंद्र सरकार का फैसला ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू ईंधन उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार बाजार पर करीबी नजर बनाए हुए है। हालांकि आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि घरेलू ईंधन कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा।
Diesel और ATF Export पर सरकार सख्त: विंडफॉल टैक्स बढ़ा, पेट्रोल शुल्क यथावत
खबर विस्तार : -

Windfall tax hike: केंद्र सरकार ने वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बढ़ती अस्थिरता और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर विंडफॉल गेन टैक्स बढ़ाने का फैसला किया है। मंगलवार से लागू इस निर्णय का उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना और निर्यातकों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अंतर का अत्यधिक लाभ उठाने पर रोक लगाना है।

हालांकि सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया है। इसके साथ ही घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को भी यथावत रखा गया है, जिससे आम जनता को फिलहाल ईंधन कीमतों में किसी बदलाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।

क्या है नया टैक्स ढांचा?

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, डीजल के निर्यात पर लगने वाला विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) बढ़ाकर 14 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इससे पहले यह 13.50 रुपये प्रति लीटर था। इसी तरह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर एसएईडी को 9.50 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 12.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। यह बढ़ोतरी विमानन ईंधन के निर्यात को महंगा बनाएगी और घरेलू उपलब्धता को प्राथमिकता देने में मदद करेगी। वहीं पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाला शुल्क 1.50 रुपये प्रति लीटर पर ही बरकरार रखा गया है। सरकार ने इस श्रेणी में किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया है।

हर 15 दिन में होती है समीक्षा

विंडफॉल गेन टैक्स एक ऐसा कर है जिसे सरकार ऊर्जा कंपनियों द्वारा असाधारण परिस्थितियों में होने वाले अतिरिक्त मुनाफे पर लगाती है। भारत में इस टैक्स की समीक्षा हर 15 दिन में की जाती है। इसका निर्धारण मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, रिफाइनिंग मार्जिन और वैश्विक बाजार स्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। यदि वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होती है और कंपनियों को अप्रत्याशित लाभ मिलने लगता है, तो सरकार टैक्स बढ़ाकर उस अतिरिक्त लाभ का एक हिस्सा राजस्व के रूप में प्राप्त करती है।

पश्चिम एशिया तनाव का असर

हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। क्षेत्र में संघर्ष और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। तेल उत्पादक क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ता है। यही वजह है कि कई देशों की सरकारें ईंधन सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गई हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, ऐसे समय में घरेलू उपलब्धता को प्राथमिकता दे रहा है।

मार्च और मई में भी लिए गए थे फैसले

सरकार ने इससे पहले 26 मार्च को डीजल और एटीएफ के निर्यात पर शुल्क लगाने का फैसला किया था। उस समय भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली थी। इसके बाद 16 मई को पेट्रोल के निर्यात पर भी शुल्क लगाया गया था। इन कदमों का उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के कारण होने वाले असंतुलन को नियंत्रित करना था। ताजा संशोधन इसी नीति का विस्तार माना जा रहा है, जिसमें सरकार बाजार की परिस्थितियों के अनुसार निर्यात शुल्क को समायोजित कर रही है।

घरेलू उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा असर

सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव केवल निर्यात पर लागू होगा। घरेलू खपत के लिए इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में कोई संशोधन नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि देश के आम उपभोक्ताओं को फिलहाल पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में किसी अतिरिक्त बढ़ोतरी का सामना नहीं करना पड़ेगा। सरकार का प्रयास है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का असर घरेलू बाजार पर न्यूनतम रहे।

निर्यातकों के लिए क्या मायने?

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ा हुआ विंडफॉल टैक्स निर्यातकों के लाभ मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। इससे कंपनियां घरेलू बाजार में अधिक आपूर्ति करने के लिए प्रेरित होंगी। सरकार का मानना है कि वैश्विक कीमतों में तेजी के दौर में कुछ कंपनियां निर्यात के जरिए अधिक लाभ अर्जित कर सकती हैं। ऐसे में अतिरिक्त कर लगाकर घरेलू हितों और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक हो जाता है।

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