Siachen Loader Story : हिमालय का मौन प्रहरी - एक अनकही कहानी

खबर सार :-
Siachen Loader Story : क्या ₹50 लाख का सालाना पैकेज देशभक्ति से बड़ा है? पढ़िए लद्दाख के एक युवा लोडर की प्रेरणादायक कहानी, जो -50°C तापमान में भारतीय सेना के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर रसद पहुँचाता है।

Siachen Loader Story : हिमालय का मौन प्रहरी - एक अनकही कहानी
खबर विस्तार : -

Siachen Loader Story : दिल्ली की चिलचिलाती धूप और दफ्तर की फाइलों के बीच फंसा राहुल, अपनी थकान मिटाने के लिए परिवार के साथ लद्दाख की वादियों में था। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पद पर था, जहाँ एसी के तापमान को 2 डिग्री कम-ज्यादा करने पर बहस होती थी। लद्दाख की घुमावदार सड़कों पर उनकी गाड़ी एक 28 वर्षीय युवक, नोरबू, चला रहा था।

खिड़की से बाहर दिखते पथरीले पहाड़ों को देखते हुए राहुल ने पूछा, "नोरबू, इस हफ्ते के बाद तो पर्यटक कम हो जाएंगे। फिर तुम क्या करोगे? दिल्ली क्यों नहीं आ जाते? वहां बड़े होटलों में तुम्हारे जैसे मेहनती लड़कों की बहुत जरूरत है।"

नोरबू की आंखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने स्टेयरिंग संभालते हुए हौले से कहा, "नहीं साहब, मेरा घर यहीं है। मैं अपनी मिट्टी छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।"

"पर यहाँ की सर्दियां तो हड्डियां गला देती हैं, तब गुजारा कैसे होता है?" राहुल ने हैरानी से पूछा।

नोरबू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "साहब, जब बर्फ गिरती है, तो मैं सियाचिन चला जाता हूँ।"

राहुल ठिठक गया। "सियाचिन? वहां तो सांस लेना भी दूभर है!"

नोरबू ने विस्तार से बताना शुरू किया, और हर शब्द के साथ राहुल का अहंकार पिघलने लगा। नोरबू ने बताया कि कैसे वे लोग 15 दिन पैदल चलकर बेस कैंप पहुंचते हैं, जहां कड़कड़ाती ठंड में उनका मेडिकल टेस्ट होता है। पास होने पर उन्हें वर्दी मिलती है—वही वर्दी जिसे पहनना गौरव की बात है।

"साहब, हम सेना के लिए 'भारवाहक' (लोडर) का काम करते हैं। जब ऊपर से हेलीकॉप्टर रसद गिराते हैं, तो उन्हें चौकियों तक पहुँचाने वाला कोई नहीं होता। वहां न सड़कें हैं, न ट्रक जा सकते हैं। खच्चर भी उस ठंड में दम तोड़ देते हैं। बस हम इंसान बचते हैं।"

राहुल ने पूछा, "पर तुम रात में ही क्यों चलते हो?"

नोरबू की आवाज थोड़ी गंभीर हो गई, "रात के 2 बजे का सन्नाटा हमारा कवच है साहब। अगर स्नो-स्कूटर चलाएं या टॉर्च जलाएं, तो दुश्मन की नजर पड़ सकती है। हम अंधेरे में, अपनी पीठ पर 15 किलो राशन और गोला-बारूद लादकर ग्लेशियर की दरारों के बीच चलते हैं। -50°C तापमान होता है। वहां पसीना भी जम जाए तो जहर बन जाता है।"

नोरबू कुछ देर के लिए चुप हुआ, जैसे किसी पुराने दोस्त को याद कर रहा हो। "पिछले साल मेरा एक साथी बर्फ की गहरी दरार में समा गया। हम उसे बचा नहीं पाए। वहां मौत आहट देकर नहीं आती, वह बस बर्फ की चादर बनकर ओढ़ ली जाती है।"

राहुल का गला भर आया। उसने धीरे से पूछा, "इतना जोखिम... सरकार बहुत पैसे देती होगी न?"

नोरबू ने शांत भाव से कहा, "महीने के 18,000 रुपये साहब। तीन महीने में 50-60 हजार जुड़ जाते हैं, जिससे साल भर मेरे बच्चों की पढ़ाई और मां की दवाई का खर्च निकल जाता है। पर साहब, बात सिर्फ पैसों की नहीं है। जब बर्फीली चोटियों पर तिरंगा फहराता देखते हैं और जानते हैं कि उस जवान के पेट में जो रोटी गई है, वो मेरी पीठ पर चढ़कर आई है... तो उस सुकून की कोई कीमत नहीं होती।"

उस रात राहुल को होटल के मखमली बिस्तर पर नींद नहीं आई। उसे अपनी 50 लाख की सालाना सैलरी, लग्जरी कार और महंगे ब्रांड सब बौने लगने लगे। वह सोच रहा था कि जिस आजादी और सुरक्षा की हम शहरों में नुमाइश करते हैं, उसकी असली कीमत सियाचिन की उन अंधेरी रातों में चुकाई जाती है।

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