आत्मशुद्धि से मोक्ष तक: माघ मेला और कल्पवास की दिव्य परंपरा

खबर सार :-
माघ मेला और कल्पवास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के ऐसे स्तंभ हैं, जो व्यक्ति को आत्मशुद्धि से मोक्ष की ओर ले जाते हैं। संगम तट पर संयम, साधना और श्रद्धा के साथ बिताया गया यह समय जीवन को नई दिशा देता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक पुनर्जागरण की दिव्य यात्रा है।

आत्मशुद्धि से मोक्ष तक: माघ मेला और कल्पवास की दिव्य परंपरा
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Magh Mela Prayagraj: तीर्थराज प्रयाग में लगने वाला माघ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर हर वर्ष माघ मास में लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यह संगम केवल नदियों का नहीं, बल्कि साधना, विश्वास और आत्मचिंतन का भी संगम है। यहां आने वाला हर व्यक्ति सांसारिक बंधनों से कुछ समय के लिए मुक्त होकर आध्यात्मिक शांति की तलाश करता है।

माघ मास का पौराणिक और धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस मास में किया गया स्नान, दान, जप और तप अक्षय फल प्रदान करता है। इसी कारण प्रयागराज में प्रतिवर्ष माघ मेले का आयोजन होता है। वर्ष 2026 में माघ मेला 3 जनवरी से 15 फरवरी तक चलेगा। इस दौरान पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि जैसे छह प्रमुख स्नान पर्व श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

प्रमुख स्नान पर्व और ब्रह्म मुहूर्त का महत्व

माघ मेले में मौनी अमावस्या को सबसे पुण्यदायी स्नान माना गया है। इस दिन मौन रहकर किया गया संगम स्नान मन को शांति और आत्मा को पवित्र करता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे पापों का नाश होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। ब्रह्म मुहूर्त, यानी प्रातः 4:00 से 5:30 बजे तक स्नान को सर्वोत्तम फलदायी बताया गया है। इस समय वातावरण सात्त्विक होता है, जिससे साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

क्या है कल्पवास की परंपरा

माघ मेले की आत्मा मानी जाने वाली परंपरा है—कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है संगम तट पर एक मास तक अत्यंत संयमित और साधनापूर्ण जीवन व्यतीत करना। इसमें प्रातःकालीन स्नान, सात्त्विक भोजन, ब्रह्मचर्य, जप-तप, भजन-कीर्तन और संतों का सान्निध्य अनिवार्य माना जाता है। शास्त्रों में दिन में तीन बार स्नान का उल्लेख है, हालांकि सामान्यतः प्रातः और सायं स्नान किया जाता है। यह व्रत व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा—तीनों के शोधन की प्रक्रिया है।

कल्पवास: आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि

‘कल्प’ शब्द केवल सृष्टि-चक्र का प्रतीक नहीं, बल्कि ‘कायाकल्प’ का भी द्योतक है। आयुर्वेद में वर्णित कल्प-चिकित्सा की तरह कल्पवास भी अनुशासित जीवनशैली के माध्यम से शरीर और मन का पुनर्निर्माण करता है। गंगाजल का सेवन, नियमित दिनचर्या, सीमित आहार और प्राकृतिक वातावरण साधक को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। मकर संक्रांति के बाद सूर्य के उत्तरायण होने से यह काल साधना के लिए और भी अनुकूल माना जाता है।

अक्षय क्षेत्र में किया गया धर्म-कर्म

प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पावन संगम है। यहां हर वर्ष माघ मास में लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। संगम क्षेत्र को शास्त्रों में ‘अक्षय क्षेत्र’ कहा गया है, जहां किया गया धर्म-कर्म कभी नष्ट नहीं होता। मान्यता है कि जो साधक बारह वर्षों तक निरंतर कल्पवास करता है, वह मोक्ष का अधिकारी बनता है। कल्पवास से लौटे श्रद्धालु अपने भीतर शांति, विवेक और सकारात्मकता लेकर समाज में लौटते हैं और भारतीय संस्कृति के संवाहक बनते हैं। यही कारण है कि यह परंपरा युगों से निरंतर चली आ रही है।

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