Baidyanath Dham Tilakotsav : बसंत पंचमी पर बैद्यनाथ धाम में शुरू हुआ तिलकोत्सव, महादेव को दिया गया विवाह बारात का आमंत्रण

खबर सार :-
Baidyanath Dham Tilakotsav : बसंत पंचमी पर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शुरू हुआ तिलकोत्सव, जहां महिलाओं ने भगवान शिव को विवाह बारात लाने का दिया अनोखा निमंत्रण। जानिए इस प्राचीन परंपरा का महत्व।

Baidyanath Dham Tilakotsav : बसंत पंचमी पर बैद्यनाथ धाम में शुरू हुआ तिलकोत्सव, महादेव को दिया गया विवाह बारात का आमंत्रण
खबर विस्तार : -

देवघर (झारखंड): देशभर में जहां 23 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना की जाएगी, वहीं झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में इस दिन एक अलग ही आध्यात्मिक उल्लास देखने को मिलता है। बसंत पंचमी के साथ ही यहां भगवान शिव के विवाह से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा का शुभारंभ हो जाता है, जिसे तिलकोत्सव (Baidyanath Dham Tilakotsav) के नाम से जाना जाता है।

इस दिन बाबा बैद्यनाथ को दिया जाता है विवाह की बारात लाने का निमंत्रण

बैद्यनाथ धाम, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में एक विशेष स्थान रखता है, बसंत पंचमी के दिन शिव-पार्वती विवाह की पहली रस्म का साक्षी बनता है। इस दिन बाबा बैद्यनाथ को विवाह की बारात लाने का प्रतीकात्मक निमंत्रण दिया जाता है। खास बात यह है कि इस आयोजन में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। महिला श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार भगवान शिव को तिलक लगाकर उन्हें शिवरात्रि के लिए बारात लाने का आग्रह करती हैं। मिथिलांचल क्षेत्र के लोग स्वयं को मां पार्वती का पक्ष मानते हुए इस आयोजन में विशेष रूप से भाग लेते हैं। श्रद्धालु अपने साथ धान की बाली, तिल, लड्डू, घी, फूल और मिष्ठान लेकर मंदिर पहुंचते हैं। पहले विधिवत पूजा-अर्चना होती है, इसके बाद शिवलिंग को बेलपत्रों और पुष्पों से सजाया जाता है। गर्भगृह में महिलाओं द्वारा तिल और मिठाई अर्पित कर बाबा का तिलक किया जाता है।

त्रेता युग से चली आ रही है तिलकोत्सव की यह परंपरा

मान्यता है कि तिलकोत्सव की यह परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है। पहले इस रस्म को संत-महात्मा और ऋषि-मुनि निभाते थे, लेकिन समय के साथ अब आम श्रद्धालु भी ‘तिलकहरु’ बनकर इस धार्मिक आयोजन में भाग लेते हैं। यह परंपरा बसंत पंचमी से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलती है, जब भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह का उत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बैद्यनाथ धाम वह स्थल है जहां मां सती का हृदय गिरा था, इसी कारण इसे शिव-पार्वती के मिलन का पवित्र स्थान माना जाता है। बाबा बैद्यनाथ को मनोकामना ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, जहां श्रद्धालु अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए दर्शन और पूजा करते हैं। हर वर्ष लाखों भक्त इस अनूठी परंपरा का साक्षी बनने देवघर पहुंचते हैं।

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