संघ का लक्ष्य परम वैभवशाली भारत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य परम वैभवशाली भारत की स्थापना है। संघ का संकल्प आगामी वर्षों में संगठित हिंदू समाज को और अधिक मजबूत करना है। इसके संरचनात्मक कार्यक्रम समय के अनुकूल तथा देश और काल की आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तनशील रहे हैं। बदलते परिवेश में संघ स्वयं को राष्ट्रीयता के आधार पर प्रकट कर रहा है। परिवर्तन एक शाश्वत सत्य है, जो सामाजिक परिस्थिति इस परिवर्तन को आवश्यक बनाती हैं।
प्राचीन और आधुनिक भारतीय ज्ञान परंपराओं में राष्ट्र केवल भौगोलिक या राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता रूप में समझा गया है। राष्ट्र एक पवित्र भू- रचना है ,जो शताब्दियों से संचित बौद्धिक स्मृतियों,ज्ञान परंपराओं और सामूहिक चेतना की भावनात्मक एक एकत्रता है । भारत माता वह पावन मातृ भूमि है जिसके चरणों की पूजा समुद्र भी करता है; जिसने हिमालय को अपने मुकुट के रूप में धारण किया है; और जो मननशील तपस्वियों, तत्त्ववेत्ता दार्शनिकों एवं तेजस्वी ऋषियों की सनातन परंपरा से अलंकृत है। राष्ट्र उन व्यक्तियों में सामूहिक मनोनैतिक, भावनात्मक लगाव और प्रबल आस्था का विश्वास कराता है।
संघ द्वारा प्रतिपादित दृष्टिकोण प्रासंगिक है क्योंकि वह राष्ट्र को एक सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है । यह दृष्टिकोण कर्तव्यबोध ,सामाजिक समरसता, समाजिक एकात्मकता एवं वैचारिक सतर्कता को परमवैभव भारत की प्राप्ति के लिए अनिवार्य मानता है । भारत माता के प्रति श्रद्धा की भावना भारतीयता के उत्थान को प्रोत्साहित करने वाला आदर्श आचरण है। संघ का सभ्यतागत दृष्टिकोण सांस्कृतिक आत्मविश्वास ,सामाजिक समन्वय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर आधारित एक विवेकी परिकल्पना प्रस्तुत करता है जो वैभवशाली भारत के साकार होने के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है।
संघ का कार्य सामाजिक चेतना का निरंतर प्रसार है; इसके द्वारा हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति के प्रति जागरण लाया जाता है। संघ का उद्देश्य एक ऐसे समृद्ध और सशक्त समाज का निर्माण करना है जिसके माध्यम से वैश्विक संकटों का सामना कर एक शांतिपूर्ण एवं संतुलित विश्व स्थापित किया जा सके। यही दृष्टि तभी साकार हो सकती है जब हिंदू समाज आंतरिक सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पुनर्जीवन एवं सामाजिक एकात्मकता की दिशा में ठोस रूप से मजबूत हों।
संघ वैश्विक स्तर का सर्वाधिक व्यापक, सामाजिक, गैर- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संगठन है। इसका प्रमुख लक्ष्य भारत को अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है। संघ ने भारत के मौलिक बुनियाद को सशक्त किया है ,देश के संप्रभुता की रक्षा किया है। संघ के सहयोग से कमजोर वर्गों को सशक्त किया है और भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के मूल्यों का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है।
महात्मा गांधी ,डॉ. बी .आर अंबेडकर जी, सुभाष चंद्र बोस और गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की शिक्षाओं एवं सिद्धांतों से निकलने वाला सार यही है कि राष्ट्र को सशक्त करना आवश्यक है ।राष्ट्र- निर्माण के प्रति कर्तब्यबोध को प्राथमिकता देते हुए राष्ट्रीय मूल्य और आदर्शों को मजबूत करना अति महत्वपूर्ण है।
हर स्वयंसेवक समर्पित, कर्तव्यनिष्ठ और सेवा -परमार्थ की भावना से प्रेरित होकर समाज के विविध क्षेत्रों में कार्यरत है। संघ के स्वयंसेवक एवं अधिकारी निः स्वार्थ भाव से सेवा कर समाज के निर्माण में सक्रिय योगदान दे रहे हैं। इन सब का मूल उद्देश्य स्पष्ट एवं उच्चतम है: भारत को परम वैभवशाली सर्वशक्तिमान एवं वैश्विक गुरु के रूप में स्थापित करना है।
संघ का शताब्दी वर्ष इसी दायित्व और लक्ष्य का प्रतीक है। यह अवसर हमें याद दिलाता है कि हिंदू समाज को संगठित करके, उसे सज्जन एवं नैतिक स्रोतों का प्रसार करके तथा समाज में एकता और सौहार्द स्थापित कर राष्ट्रीय एकता एवं सांस्कृतिक गौरव को उन्नत किया जा सकता है। संगठन का प्रयत्न केवल संगठनात्मक विस्तार तक सीमित नहीं है; इसका आशय समाज के हर व्यक्ति में सहयोग, सहिष्णुता और परोपकार की भावना जाग्रत करना है।
संघ शुद्धिकरण एवं सशक्तिकरण के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण और नवोन्मेष साथ-साथ संभव है। जब समाज के भीतर सद्भाव एवं स्नेह का वातावरण निर्मित होगा ,तब राष्ट्रीय धारा में सामूहिक ऊर्जा का संचार होगा ,जो देश की समृद्धि और वैश्विक प्रतिष्ठा को नए आयाम दे सकेगा। संघ का शताब्दी समारोह इस व्यापक दृष्टि समाज के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए का उत्सव और प्रेरक पंक्तियों में संकल्प है।
संघ एक सामाजिक, गैर- राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन है जिसके करोड़ समर्पित स्वयंसेवक चरित्र- निर्माण एवं व्यक्ति -निर्माण के साथ राष्ट्र - निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। परमपूज्य आद्य सरसंचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने सन् 1925 में परम वैभवशाली भारत की परिकल्पना को साकार करने के उद्देश्य से अपने निकट सहयोगी स्वयंसेवकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। तत्कालीन समय के शासकीय ढांचे में ब्रिटिश शासन जनता के नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं का मनमाना तथा जबरदस्ती दमन कर रहा था । प्रेस की स्वतंत्रता ,आवाज की आजादी और जनजीवन को प्रभावित करने वाले नियामकीय तंत्र तथा असंवेदनशील नौकरशाही अपने निरंकुश अधिकारों से साधारण जनजीवन को दबा रही थी।
आद्य सरसंघचालक ने ऐसे विषम समय में हिंदुओं के बीच सामाजिक व सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करके स्वतंत्रता -संग्राम के लिए तैयार किए राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से चरित्र -निर्माण को लक्ष्य बनाकर संघ के स्वयंसेवक समाज और राष्ट्र के विभिन्न आयामों - सेवा, शिक्षा ,चिकित्सा, छात्र ,श्रमिक कार्य, इतिहास एवं राजनीतिक गतिविधियों में राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धांत को जीवन का आधार मानते हुए समर्पित भाव से राष्ट्र -सेवा में लगे रहे। संघ एक विशिष्ट संगठन है जिसनेब सेवा भावना को साधन बनाकर राष्ट्र- सेवा के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दीर्घकालिक संकल्प लिया है।
संघ का लक्ष्य समरसता एवं राष्ट्रीय एकता स्थापित करना रहा है । संघ ने अपने सतत् और व्यापक कर्मठ प्रयासों के चलते शताब्दी यात्रा पूर्ण की है। शताब्दी अवधि के भीतर संगठन ने सेवा एवं समर्पण की भावना के साथ समाज में व्यापक जागरण उत्पन्न किया। इन गतिविधियों की उपयोगिता व्यक्तित्व -निर्माण तथा राष्ट्र -निर्माण के क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित हुई। परिणामस्वरूप समाज में सामाजिक समरसता एवं सामूहिक बोध की सकारात्मक पृष्ठभूमि स्थापित हुई है।
संघ की व्यवहारिक उपयोगिता, सामयिक प्रासंगिकता और सामाजिक योगदान के कारण वह व्यापक सफलता की दिशा में अग्रसर है। अनेक चुनौतियां एवं कठिनाइयों का सामना करते हुए संगठन ने समाधान क्षमता एवं अनुकूलनशीलता का प्रदर्शन किया है। संघ का मौलिक लक्ष्य समरस भारत के निर्माण की कल्पना पर केंद्रित है एक ऐसा भारत जो जातिगत विभाजन तथा संकीर्ण विचारधाराओं से ऊपर उठकर समावेशी एवं समान अवसर प्रदान करने में सक्षम हो।
समाज की उन्नति के लिए संघ संगठनात्मक मजबूती और सामूहिक प्रयत्नों पर बल देता है। उसके अनुसार समरस एवं समर्थ भारत का निर्माण तभी संभव है जब सबको साथ लेकर चलने की नीति अपनाई जाए ;सामूहिक संकल्प, साझा दायित्व और सहयोगी व्यवहार ही दीर्घकालिक विकास एवं सामाजिक समरसता के आधार बनते हैं। इस दृष्टि से संघ सामुदायिक एकता व सामाजिक - संस्थागत ढांचे निर्मित करने पर भी कार्य करता है ,बल्कि ऐसे सामाजिक संगठन संस्थागत ढांचे निर्मित करने पर भी जोर देता है जो समावेशी विकास ,राष्ट्रीय एकात्मकता, सतत् सामरिक एवं सामाजिक क्षमताओं को सुदृढ़ कर सकें।
संघ का लक्ष्य राष्ट्र के सर्वाधिक विकास में सभी वर्गों का समुचित योगदान सुनिश्चित करना है।यह संगठन सामयिक में हर प्रकार के भेदभाव को समाप्त कर एक समर्थ और संगठित समाज के लिए काम करता है। संघ एक संगठन नहीं ,बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन है । संघ ने समाज को जातिगत और उच्च -नीच के मानसिक एवं सामाजिक बंधनों से मुक्त कर हिंदू समाज को एकजुट करने का सफल प्रयत्न है। संघ का मौलिक उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना है। समकालीन परिप्रेक्ष्य में संघ द्वारा सामाजिक समरसता के लिए किए जा रहे प्रयत्न अधिक आवश्यक, अधिक उपयोगी और अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। जब भारत वैश्विक गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है तब जाति ,भाषा और क्षेत्रीय दीवारों को समतलब करना अनिवार्य है।
भारत में सामाजिक समरसता पर संघ का दृष्टिकोण जातिगत भेदभाव को पीछे रखकर समाज की एकात्मकता और सामूहिक सामर्थ्य पर बोल देता है। संघ के पंचम सरसंचालक पूजनीय के सी सुदर्शन जी इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई; वे सामाजिक कुरीतियों एवं अन्य सामाजिक बुराइयों को विकासात्मक तथा सशक्त समाज के निर्माण में प्रमुख बाधा मानते थे। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं व कुरीतियों के निषेध के लिए सामाजिक और नैतिक चेतना जाग्रत कर सक्रिय सहभागिता का आह्वान किए। संघ ने नियमित रूप से व्याख्यान, कार्यशालाएं, जन जागरूकता कार्यक्रम और सेवा -उन्मुख पहलों के माध्यम से सामाजिक एकता, सह कार्य और सामुदायिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है ।संगठन का मूल उद्देश्य समानता - प्रधान संगठित और सशक्त राष्ट्र का निर्माण है, जो समाज के नैतिक तथा व्यवहारिक सुधारो के साथ ही समरसता पर आधारित है।
संघ का पंच परिवर्तन परिवार, समाज और राज्य में गुणात्मक परिवर्तन का संदेश दे रहा है। सामाजिक समरसता से जातिगत -भेदभाव ,उच्च- नीच और कुरीतियां दूर की जा रही है परिवार प्रबोधन भारतीय जीवन का मूलाधार है। यह परंपरा और नैतिक मूल्यों के व्यावहारिक परिवर्तन का माध्यम है । पर्यावरण -संरक्षण के माध्यम से प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर सतत विकास को प्राथमिकता दी जा रही है ।यह संविधानगत मौलिक कर्तव्य और नैतिक दायित्व है । आत्म -परिष्कार व स्वाध्याय स्वयंसेवकों में अनुशासन, साधना और आत्म- सुधार की प्रवृत्ति जागते हैं । राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता और एकात्मकता समाज में सेवा, समर्पण एवं त्याग की भावना को पुष्ट करते हैं।
संगठित एवं जाग्रत समाज की नैतिक शक्ति, धर्मानुकूल आचरण, सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और निः स्वार्थ नागरिक कर्तव्यों के संयोजन से राष्ट्र परम वैभवशाली भारत की ओर अग्रसर हो रहा है।
भारत विकसित भारत @2047 की ओर बढ़ रहा है। एक ऐसी दिशा जहां सामूहिक मानवीय चेतना ,सामाजिक सरोकार और समन्वय नई ऊंचाइयों को छूते हैं ।सभ्यतागत समर्पण और नि:स्वार्थ सेवा के माध्यम से संघ और उसके समर्पित कार्यकर्ता राष्ट्र के पुनर्निर्माण के अग्रदूत बनेंगे । उनका लक्ष्य भौतिक विकास नहीं बल्कि मूल्य -आधारित प्रगति है- परम वैभवशाली ,न्याय संगत और संस्कृति- समृद्ध भारत का निर्माण।
डॉ.सुधाकर कुमार मिश्रा
स्वतंत्र टिप्पणीकार
अन्य प्रमुख खबरें
-
भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय - आपातकाल
2026-06-25
-
2026-06-19
-
जश्न के बहाने, भविष्य के संकेत -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारह वर्ष
2026-06-12
-
2026-06-03
-
राष्ट्र निर्माण के प्रति संकल्पित संघ
2026-05-27
-
महिला शक्ति की जागरूकता : लोकतंत्र का बदलता स्वर
2026-05-15
-
संघ का लक्ष्य परमवैभवशाली भारत की स्थापना
2026-05-15
-
RG Kar Medical College Case : प.बंगाल दुष्कर्म-हत्या की पीड़िता को इंसाफ दिलाने की चुनौती
2026-05-13
-
कानून-व्यवस्था से लेकर विकास तक, बंगाल की सुवेंदु सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां
2026-05-11
-
West Bengal Post-Poll Violence : सरकार के लिए चुनौती है राजनीतिक हत्याओं पर विराम लगाना
2026-05-08
-
बंगाल चुनाव परिणाम– स्वर्णिम भविष्य का संकेत
2026-05-06
-
भाजपा का ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा: अंग-बंग-कलिंग पर भगवा शासन
2026-05-06
-
पश्चिम बंगाल में बीजेपी: सतत् संघर्ष का परिणाम!
2026-05-06
-
केरल के मतदाताओं ने ठोका वामपंथियों के ताबूत में आखिरी कील
2026-05-05
-
West Bengal: मोदी पर बढ़ता जनविश्वास, भगवा लेता विस्तार
2026-05-04