नई दिल्ली: बदलते दौर की भागदौड़ और जहरीली होती हवा हमारे फेफड़ों की दुश्मन बनती जा रही है। 'विश्व अस्थमा दिवस' के अवसर पर सामने आए आंकड़े डराने वाले हैं। वर्तमान में पूरी दुनिया में करीब 26 करोड़ लोग सांस की इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति भारत की है, जो दुनिया के कुल अस्थमा पीड़ितों का लगभग 13 प्रतिशत बोझ अकेले उठा रहा है।
चिकित्सीय भाषा में समझें तो अस्थमा फेफड़ों की वायु नलिकाओं की एक पुरानी बीमारी है। इसमें श्वसन मार्ग में सूजन आ जाती है, जिससे नलियां संकुचित हो जाती हैं। नतीजतन, हवा का प्रवाह बाधित होता है और मरीज को सांस लेने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। धूल, धुआं, प्रदूषण और बदलती जीवनशैली इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में वैश्विक स्तर पर अस्थमा से प्रभावित लोगों की संख्या 36 करोड़ से अधिक रही, जिनमें से 4.42 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत में मौतों का यह आंकड़ा वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे मुख्य कारण बीमारी को लेकर सामाजिक शर्म (स्टिग्मा), जागरूकता का अभाव और इलाज शुरू करने में होने वाली देरी है।
अस्थमा अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा। शहरी इलाकों में रहने वाले 3 से 20 प्रतिशत बच्चे इसके लक्षणों की चपेट में हैं। निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और वाहनों का धुआं बच्चों के कोमल फेफड़ों को समय से पहले बीमार कर रहा है। यदि बचपन में ही घरघराहट या सीने में जकड़न जैसे लक्षणों पर ध्यान न दिया जाए, तो यह जीवन भर की समस्या बन सकती है।
इलाज की बात करें तो भारत में आज भी 'इनहेलर' को लेकर कई भ्रांतियां हैं। लोग इसे 'अंतिम विकल्प' या 'आदत लगने वाली दवा' समझते हैं। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। डॉक्टरों के मुताबिक, इनहेलर दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाता है, जिससे शरीर के अन्य अंगों पर दुष्प्रभाव नगण्य होता है। इस वर्ष की थीम भी इसी पर केंद्रित है कि हर मरीज तक 'एंटी-इंफ्लेमेटरी इनहेलर' की पहुंच सुनिश्चित हो।
अस्थमा को जड़ से खत्म करना भले ही चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन इसे नियंत्रित करना पूरी तरह संभव है। सही समय पर पहचान, प्रदूषण से बचाव और बिना डरे इनहेलर का प्रयोग करके अस्थमा रोगी भी एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकते हैं।
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