नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में शुक्रवार का दिन एक बड़े राजनीतिक उलटफेर का गवाह बना। महिलाओं को नीति-निर्धारण में हिस्सेदारी देने का वादा करने वाला 'महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा 131वां संशोधन विधेयक' लोकसभा की दहलीज पर आकर दम तोड़ गया। सदन में हुई वोटिंग के दौरान सत्ता पक्ष जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रहा, जिसके चलते करोड़ों महिलाओं की उम्मीदें एक बार फिर अधर में लटक गई हैं।
संसद के इस विशेष सत्र (Parliament Special Session) में शुक्रवार शाम जब वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हुई, तो सदन में गहमागहमी चरम पर थी। गणना के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा की कि बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 सदस्यों ने मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा न छू पाने के कारण इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। पहले चरण की वोटिंग में भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी, जहाँ 489 कुल मतों में से केवल 278 पक्ष में आए थे।
बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने परिसीमन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए प्रशासनिक विसंगतियों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में संसदीय क्षेत्रों के आकार में भारी असमानता है। शाह ने सवाल उठाया, "जब एक सांसद के क्षेत्र में 49 लाख मतदाता हों और दूसरे के पास मात्र 60 हजार, तो जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी कैसे निभाएगा?" उन्होंने तर्क दिया कि जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने और सुलभ शासन के लिए समय-समय पर परिसीमन (Delimitation Process) करना संवैधानिक बाध्यता और जरूरत दोनों है।
दूसरी ओर, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे महिलाओं के साथ एक 'छलावा' करार दिया। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने दावा किया कि इस बिल का असली मकसद महिलाओं को हक देना नहीं, बल्कि चुनावी नक्शे (Electoral Map) में फेरबदल कर राजनीतिक लाभ लेना है। उन्होंने आगाह किया कि यह प्रस्ताव सदन में गिर जाएगा क्योंकि इसमें जटिलताएं जानबूझकर डाली गई हैं। विपक्ष का मुख्य आरोप यह रहा कि सरकार आरक्षण के बहाने परिसीमन के जरिए देश की राजनीतिक संरचना को बदलना चाहती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन के सभी दलों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस बिल का समर्थन करने की अपील की थी, लेकिन विपक्ष की आपत्तियों और वोटिंग के नतीजों ने सरकार की इस योजना पर पानी फेर दिया। फिलहाल, महिला आरक्षण (Women Reservation Bill) का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है, जिससे 50 फीसदी आबादी (Half Population Rights) के प्रतिनिधित्व की राह और कठिन हो गई है।
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